LAW'S VERDICT

“77 साल के कैदी की गुहार पर हाईकोर्ट का मानवीय रुख: ‘बेफिक्र रहो, हम दे रहे वकील’”

भाई की हत्या के आरोप में बालाघाट की अदालत ने 11 साल पहले सुनाई थी उम्रकैद की सजा 

जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक बार फिर मानवीय संवेदनशीलता का परिचय देते हुए हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 77 वर्षीय कैदी बाबूलाल को बड़ी राहत दी है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान कहा—“तुम बेफिक्र रहो, तुम्हें वकील मिलेगा और उसकी फीस भी तुम्हें नहीं देनी होगी।”

लीगल ऐड से मिला वकील, फीस भी नहीं लगेगी 

बालाघाट निवासी बाबूलाल ने कोर्ट के सामने अपनी आर्थिक स्थिति बताते हुए कहा कि वह वकील रखने में असमर्थ है। इस पर अदालत ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए उसे निःशुल्क विधिक सहायता (लीगल ऐड) उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। कोर्ट ने अधिवक्ता अरुण विश्वकर्मा को बाबूलाल का वकील नियुक्त किया और साफ किया कि उनकी फीस का पूरा भुगतान लीगल ऐड के माध्यम से किया जाएगा। बाबूलाल को एक भी रुपया खर्च नहीं करना होगा।

शक में भाई की हत्या, मिली उम्रकैद

मामला बालाघाट जिले के लांजी थाना क्षेत्र का है। 10 मई 2014 की रात बाबूलाल ने अपने भाई देवलाल की कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी थी। उसे शक था कि देवलाल के जादू-टोने के कारण उसकी पत्नी बीमार रहती है।

इस मामले में बालाघाट की सत्र अदालत ने 15 मई 2015 को बाबूलाल को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसी फैसले के खिलाफ बाबूलाल ने 2015 में हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जो अब सुनवाई में है।

कोर्ट ने पहले वकील से मिलने को कहा

प्रोडक्शन वारंट के तहत पेश किए गए बाबूलाल के पास कोई अधिवक्ता नहीं था। जब अदालत ने पूछा तो उसने अपनी मजबूरी बताई। इसके बाद बेंच ने पुलिस को निर्देश दिया कि पहले आरोपी को उसके नए वकील से मिलवाया जाए, ताकि वह वकालतनामा पर हस्ताक्षर कर सके। इसके बाद ही उसे वापस जेल भेजा गया।

न्याय के साथ संवेदना का संदेश

हाईकोर्ट का यह रुख बताता है कि न्याय व्यवस्था केवल कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए समान अवसर भी सुनिश्चित करती है—चाहे वह कितना ही गरीब या असहाय क्यों न हो।

हाईकोर्ट का आदेश देखें CRA-3391-2015

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