सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जस्टिस धूलिया कमेटी ने साफ़ की स्थिति और पदाधिकारियों को माना अपात्र
जबलपुर। मप्र स्टेट बार कॉउन्सिल के 12 मई को होने वाले चुनाव को लेकर बड़ी खबर आई है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राष्ट्र स्तर पर बनाई गई जस्टिस सुधांशु धूलिया की कमेटी ने मंगलवार की रात को सुनवाई करके स्पष्ट किया कि चुनाव को लेकर संशोधित की गई अधिसूचना अभी अस्तित्व में नहीं है, जो करीब 15 दिनों में अमल में आएगी। ऐसे में मौजूदा परिस्थिति में बार के पदाधिकारी चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं हैं। जस्टिस धूलिया कमेटी के इस फैसले से साफ़ हो गया है कि जबलपुर के 4 उम्मीदवारों के साथ प्रदेश के कुल 11 उम्मीदवार, जो बार एसोसिएशनों में पदाधिकारी हैं, वो चुनाव नहीं लड़ सकेंगे।
क्या है विवाद की असली वजह
दरअसल, 12 मई को होने वाले स्टेट बार कॉउन्सिल चुनावों के लिए राज्य के कई बार एसोसिएशनों के पदाधिकारियों ने नामांकन भरने का मन बनाया था। शुरूआती दौर में नामांकन भरने पर BCI के नियमों के कारण विवाद होने पर मप्र हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष डीके जैन, सचिव परितोष त्रिवेदी और जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मनीष मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। BCI का नियम था कि बार एसोसिएशन के पदाधिकारी स्टेट बार का चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को अनुचित ठहराते हुए बार कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया (BCI) को कहा था कि वो एक सप्ताह के भीतर इस नियम में संशोधन करे। इस बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बार के पदाधिकारियों ने अपने नामांकन दाखिल कर दिए थे। साथ ही यह अंडरटेकिंग भी दी थी नतीजे आने और चुनाव जीतने पर 15 दिनों में वो किसी एक पद से इस्तीफा दे देंगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा BCI के नियम को अनुचित ठहराए जाने पर मप्र की राज्य स्तरीय चुनाव समिति ने जस्टिस धूलिया कमेटी से मार्गदर्शन माँगा कि अब आगे क्या किया जाए? जस्टिस धूलिया कमेटी ने स्पष्ट किया कि चूंकि हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के मामलों में नामांकन निरस्त करने को जायज ठहराया गया, इसलिए अब दोहरा मापदंड नहीं अपनाया जा सकता है।
उम्मीदवारों के नामांकन हुए निरस्त
जस्टिस धूलिया कमेटी का रुख स्पष्ट होने के बाद मप्र स्टेट बार कॉउन्सिल की चुनाव समिति ने उन सभी 11 उम्मीदवारों के नामांकन निरस्त कर दिए, जो बार के पदाधिकारी हैं। समिति ने उन 8 उम्मीदवारों के भी नामांकन निरस्त किये थे, जिन पर आपराधिक मामले हैं या फिर जिनके मामले अपील समिति के सामने लंबित हैं। इस फैसले को बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 20 अप्रैल को हुई सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय के सामने BCI की संशोधित अधिसूचना पेश की गई। इस पर शीर्ष अदालत ने राष्ट्र स्तर पर बनाई गई धूलिया कमेटी को विचार करने कहा था।
धूलिया कमेटी ने माना- अधिसूचना अस्तित्व में नहीं
बीते मंगलवार की रात को जस्टिस धूलिया कमेटी ने फिर से मामले पर सुनवाई की। सुनवाई में सभी पक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा। सुनवाई में कमेटी ने पाया कि BCI ने नियमों में संशोधन तो कर दिया है, लेकिन उसकी अधिसूचना जारी नहीं हुई है। जस्टिस धूलिया ने पूछा कि अधिसूचना कब तक जारी होगी? जवाब में कहा गया कि उसके प्रकाशन में 10 से 15 दिनों का वक़्त लगेगा। इस पर जस्टिस धूलिया ने माना कि चूंकि संशोधित नियम अधिसूचित न होने के कारण फिलहाल अस्तित्व में नहीं हैं, इसलिए पुराना नियम ही आज की तारीख में अस्तित्व में रहेगा। इन आधारों पर जस्टिस धूलिया कमेटी ने बार के पदाधिकारियों के नामांकन पत्र निरस्त किये जाने को सही ठहराया है।
हमारे साथ अन्याय हुआ
इस बारे में मप्र हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष डीके जैन का कहना है कि जिस नियम से हमारा नामांकन पत्र निरस्त हुआ, वो नियम वर्ष 2016 में बना था। पिछले 10 वर्षों में 2 बार स्टेट बार कॉउन्सिल के चुनाव हुए, जिसमे कई बार एसोसिएशनों के पदाधिकारियों ने चुनाव लड़े और जीते भी। अब 10 साल नियमों को अमल में लाकर हमारे साथ अन्याय किया जा रहा है। हम शांत नहीं रहेंगे।
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