भोपाल की MSME कंपनी की याचिका पर हाईकोर्ट ने माँगा सरकार से जवाब, सुनवाई 13 मई को
जबलपुर। भोपाल की एक पंजीकृत MSME (माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइज) कंपनी ने मध्यप्रदेश सरकार के लोक संचालनालय आयुक्त द्वारा जारी एक एक बड़े टेंडर को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। कंपनी ने आरोप लगाया है कि ICT लैब उपकरणों की सप्लाई, इंस्टॉलेशन, टेस्टिंग और कमीशनिंग के लिए जारी टेंडर में ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिनसे छोटे और मध्यम उद्योगों को बाहर कर दिया गया है। मामला सांदीपनि/आईसीटी लैब उपकरण/2025-26 की निविदा से जुड़ा है, जो 13 जनवरी 2026 को जारी की गई थी। याचिकाकर्ता कंपनी का कहना है कि यह टेंडर मनमाना, अवैध और दुर्भावनापूर्ण तरीके से तैयार किया गया है। मामले पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीज़न बेंच ने दो टूक कहा कि सरकार का यह ठेका पूरी तरह UNWORKABLE है। देश में ऐसी कोई कंपनी नहीं है, जो 90 दिनों के भीतर 25 हजार कम्प्यूटरों की सप्लाई करके उसको इंस्टॉल कर सके। डिवीज़न बेंच ने मामले पर राज्य सरकार व अन्य को नोटिस जारी कर जवाब देने कहा है। अगली सुनवाई 13 मई को होगी।
₹580 करोड़ टर्नओवर की शर्त पर उठे सवाल
भोपाल की में. प्लेक्सस आईटी सिस्टम (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दाखिल इस याचिका में सबसे बड़ा मुद्दा OEM (Original Equipment Manufacturer) के लिए ₹580 करोड़ वार्षिक टर्नओवर की अनिवार्यता को बताया गया है। कंपनी का कहना है कि यह शर्त पूरी तरह अनुचित है, क्योंकि MSME श्रेणी के मध्यम उद्योगों की अधिकतम सीमा ही ₹250 करोड़ तक है।
ऐसे में ₹580 करोड़ टर्नओवर की शर्त लगाकर सभी MSME कंपनियों को टेंडर प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। याचिकाकर्ता ने इसे स्थानीय उद्योगों के खिलाफ साजिश और प्रतिस्पर्धा खत्म करने का प्रयास बताया है।
‘Estimated Bid Value’ छिपाने का आरोप
कंपनी ने यह भी आरोप लगाया है कि टेंडर दस्तावेज में “Estimated Bid Value” यानी अनुमानित निविदा राशि का खुलासा नहीं किया गया। याचिका में कहा गया है कि यह मध्यप्रदेश स्टोर परचेज रूल्स के नियम 3.6 का उल्लंघन है।
विशेषज्ञों के मुताबिक किसी भी सरकारी टेंडर में Estimated Bid Value बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी के आधार पर पात्रता शर्तें, टर्नओवर, अनुभव और Earnest Money Deposit (EMD) तय किए जाते हैं। यदि यह राशि सार्वजनिक नहीं की जाती, तो पूरी निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
Make in India नीति को झटका
याचिकाकर्ता कंपनी ने कहा कि वह “Make in India” दिशा-निर्देशों का पालन करने वाली भोपाल स्थित इकाई है, लेकिन ऐसी शर्तों के कारण राज्य के स्थानीय उद्योगों को अवसर नहीं मिल पा रहा। इससे आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान को भी नुकसान पहुंच रहा है। कंपनी ने हाईकोर्ट से मांग की है कि विवादित टेंडर शर्तों को निरस्त किया जाए और नई, पारदर्शी एवं निष्पक्ष निविदा प्रक्रिया शुरू की जाए, ताकि MSME कंपनियों को भी बराबरी का मौका मिल सके। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनुराग गोहिल की दलीलों को सुनने के बाद बेंच ने याचिका में गए पक्षकारो को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।
सरकारी टेंडर प्रक्रिया पर फिर उठे सवाल
इस याचिका के बाद एक बार फिर सरकारी टेंडरों में पारदर्शिता, निष्पक्षता और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के दावों पर सवाल खड़े हो गए हैं। अब सभी की नजर हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी है।
