LAW'S VERDICT

हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका, कहा- “मेरिट से ज्यादा Preference जरूरी”

इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने ग्रुप-4 भर्ती परीक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल अधिक अंक (merit) ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उम्मीदवार द्वारा भरी गई प्राथमिकता (preference) भी नियुक्ति में निर्णायक भूमिका निभाती है। जस्टिस जय कुमार पिल्लई की कोर्ट ने इस बारे में दायर याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले से साफ़ हो गया है कि “Preference को नजरअंदाज कर मेरिट के आधार पर पोस्ट नहीं बदली जा सकती।”  हालाँकि अदालत ने भर्ती बोर्ड को सुझाव दिया कि भविष्य में विज्ञापन और नियम पुस्तिका में merit-cum-preference सिस्टम की स्पष्ट जानकारी दी जाए, ताकि ऐसे विवाद और मुकदमे कम हों सकें।   

PHE में भर्ती का था मामला

राजगढ़ के मुल्तानपुरा में रहने वाले छात्र जितेंद्र मेवाड़े ने यह याचिका दायर कर 24 नवंबर 2025 की चयन सूची (select list) को चुनौती दी थी। मामला जल संसाधन विभाग में  Assistant Grade-III (Post Code 83) पद से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने 99.927273 percentile अंक प्राप्त किए, जबकि चयनित उम्मीदवार मयूर कुमार कोष्टा और जीतेन्द्र कुमार पटेल ने कम अंक (99.73 और 99.62 percentile) प्राप्त किए। इसके बावजूद याचिकाकर्ता का चयन न होने पर यह याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता बोला- मैं हकदार 

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसने अधिक अंक प्राप्त किए, इसलिए वह चयन का हकदार है। प्राथमिकता (preference) केवल व्यक्तिगत विकल्प है, यह मेरिट को पीछे नहीं छोड़ सकती। उसने Post Code 83 को 36वें नंबर पर रखा था, जिसे आधार बनाकर उसे वंचित नहीं किया जा सकता। 

Merit-cum-Preference सिस्टम वैध: कोर्ट 

हाईकोर्ट ने याचिका को पूरी तरह निराधार मानते हुए कहा कि  Merit-cum-Preference सिस्टम वैध है। भर्ती प्रक्रिया “merit-cum-preference” के आधार पर होती है। यानी मेरिट के साथ उम्मीदवार की प्राथमिकता भी महत्वपूर्ण है। याचिकाकर्ता को उसकी पहली पसंद (Post Code 144) मिल चुकी थी। इसके बाद वह अपनी 36वीं पसंद पर दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर एक उम्मीदवार को अपनी पसंद बदलने की अनुमति दी गई, तो पूरी चयन प्रक्रिया अस्त-व्यस्त (disrupt) हो जाएगी और इससे हजारों उम्मीदवारों के अधिकार प्रभावित होंगे। यह एक “disastrous domino effect” पैदा करेगा, जो उचित नहीं है। 

कार्रवाई नियमों के अनुसार हुई 

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने माना कि चयन बोर्ड ने नियमों के अनुसार कार्य किया। इसमें कोई अवैधता, मनमानी या संवैधानिक उल्लंघन नहीं पाया गया, इसलिए Certiorari और Mandamus जारी करने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने याचिका ख़ारिज करके भर्ती बोर्ड को सुझाव दिया कि भविष्य में विज्ञापन और नियम पुस्तिका में merit-cum-preference सिस्टम की स्पष्ट जानकारी दी जाए, ताकि ऐसे विवाद और मुकदमे कम हों सकें।   


हाईकोर्ट का आदेश देखें    W.P. No.48259/2025


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