जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने NIA को बड़ा झटका देते हुए आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामले में गिरफ्तार तीन आरोपियों को जमानत दे दी। अदालत ने साफ कहा कि केवल ‘माइंडसेट’, सेमिनार में भागीदारी या इस्लामिक साहित्य की फोटोकॉपी मिलने से किसी को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं माना जा सकता।
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की डिवीजन बेंच ने भोपाल के शेख जुनैद, मोहम्मद वसीम और मोहम्मद करीम की आपराधिक अपीलें मंजूर करते हुए जमानत दी।
कोर्ट बोला- ठोस सबूत कहां हैं?
सुनवाई के दौरान NIA की ओर से कहा गया कि आरोपियों के खिलाफ गवाहों के बयान, अन्य आरोपियों से संबंध और जब्त इस्लामिक साहित्य उनकी कट्टर मानसिकता दर्शाता है। हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि:
- आरोपियों से कोई ठोस आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई।
- केवल कुछ फोटोकॉपी जब्त की गईं।
- मोबाइल फोन जब्त होने के बावजूद किसी इंटरसेप्टेड कॉल या मैसेज के आधार पर गिरफ्तारी नहीं हुई।
- किसी आतंकी साजिश या हिंसक कार्रवाई का प्रथम दृष्टया सबूत नहीं मिला।
UAPA की धाराएं लागू करने पर सवाल
अदालत ने कहा कि UAPA की धारा 15 के तहत आतंकी कृत्य साबित करने के लिए आवश्यक तत्व रिकॉर्ड पर नहीं हैं। वहीं धारा 18, 18B और 20 के तहत साजिश, भर्ती या आतंकी संगठन की सदस्यता का भी विश्वसनीय प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सेमिनार में शामिल होना या वैचारिक साहित्य रखना, कठोर कानूनों के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के Vernon vs State of Maharashtra फैसले का हवाला देते हुए कहा कि तीसरे पक्ष के दस्तावेज, बिना ठोस लिंक और बिना प्रत्यक्ष साक्ष्य, आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं होते।
ट्रायल लंबा चलेगा, इसलिए जमानत
कोर्ट ने माना कि मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है, इसलिए आरोपियों को अनिश्चितकाल जेल में नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर जमानत मंजूर की गई।
जमानत की सख्त शर्तें
हाईकोर्ट ने निम्न शर्तों पर राहत दी:
- प्रत्येक आरोपी ₹2 लाख का निजी मुचलका देगा।
- ₹2 लाख के दो स्थानीय जमानती देने होंगे।
- तीनों को अपने पासपोर्ट सरेंडर करना होंगे।
- माता-पिता और ननिहाल पक्ष के कम से कम चार-चार स्थायी पते बताने होंगे।
- देश छोड़ने से पहले ट्रायल कोर्ट की अनुमति लेनी होगी।
- हर तारीख पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होना ही होगा।
क्यों अहम है फैसला?
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि जांच एजेंसियां केवल विचारधारा, साहित्य या मानसिकता के आधार पर किसी व्यक्ति को जेल में नहीं रख सकतीं। कठोर आतंकवाद-रोधी कानूनों में भी ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।
हाईकोर्ट का आदेश देखें CRA-8705-2024
