हाईकोर्ट ने गृह सचिव, जबलपुर एसपी समेत 4 को नोटिस जारी कर माँगा जवाब
जबलपुर। संज्ञेय अपराधों में गोरखपुर थाने के टीआई नितिन कमल द्वारा FIR दर्ज न करने के गंभीर आरोपों पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य के गृह सचिव सहित पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर दिया है। जस्टिस बीपी शर्मा की एकल पीठ ने सभी अनावेदकों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
जबलपुर के शक्ति नगर निवासी विनोद कुमार चाटे द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि गोरखपुर थाना प्रभारी नितिन कमल संज्ञेय अपराधों में भी FIR दर्ज करने से बचते हैं। कार्रवाई तब तक नहीं करते जब तक कोर्ट में अवमानना याचिका न लगाई जाए। याचिका में वर्ष 2025 के तीन अवमानना मामलों की रिपोर्ट पेश कर यह दिखाया गया कि यह एक लगातार अपनाया जा रहा तरीका है।
FIR में देरी नहीं, “जानबूझकर टालना”?
याचिकाकर्ता का आरोप है कि शिकायत देने के बावजूद FIR दर्ज नहीं की गई। पुलिस केवल दबाव या कोर्ट हस्तक्षेप के बाद ही सक्रिय होती है। इसे न्यायालय के आदेशों की अवहेलना और कर्तव्य में लापरवाही बताया गया है।
नियमों का उल्लंघन भी मुद्दा
याचिका में कहा गया है कि SHO नितिन कमल का आचरण एमपी पुलिस रेगुलेशन 64(2) और 64(4) का उल्लंघन और मप्र सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के Rule 3 और 3-A के खिलाफ है। ऐसे में उनके खिलाफ विभागीय जांच अनिवार्य बताई गई है।
जमीन विवाद और कॉलोनी का एंगल
मामले के पीछे एक बड़ा भूमि विवाद भी सामने आया है। याचिकाकर्ता का दावा है की उनकी जमीन पर कथित रूप से 15 मीटर चौड़ी सड़क अवैध रूप से बनाई गई। आरोपित कंपनियां OXY HOME Satpuda Infracon Pvt. Ltd. और Khanna Properties & Infrastructure Ltd. द्वारा फर्जी लेआउट के आधार पर TNCP से अनुमति ली गई और SDM के 2018 के आदेश को छिपाया गया।
राजस्व मामला भी लंबित
कोर्ट ने माँगा 4 सप्ताह में जवाब
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता पुनीत श्रोती की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मप्र शासन के गृह सचिव, जबलपुर एसपी, गोरखपुर सीएसपी और टीआई Nitin Kamal को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। सभी को 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
क्यों अहम है यह मामला?
यह केस सिर्फ एक थाने का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है:
- क्या FIR दर्ज करना “विकल्प” बन गया है?
- क्या आम नागरिक को न्याय के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है?
- क्या कानून का इस्तेमाल “देरी” के औजार के रूप में हो रहा है?
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-11904-2026
