सुप्रीम कोर्ट से रिकॉर्ड न पहुंचने के कारण मप्र हाईकोर्ट में सुनवाई टली
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में मध्यप्रदेश के ओबीसी आरक्षण मामले पर मंगलवार को अहम सुनवाई हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से जरूरी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण मामले की सुनवाई आगे बढ़ा दी गई। अब इस संवेदनशील प्रकरण पर 13 मई से 15 मई तक लगातार सुनवाई होगी। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच कर रही है।
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को चुनौती
यह मामला अशिता दुबे व 11 अन्य द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है, जिसमें तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने को चुनौती दी गई है।
सरकार ने 8 जुलाई 2019 को विधानसभा से संबंधित विधेयक पारित कराया था, जिसके बाद 17 जुलाई 2019 को इसका राजपत्र (गजट) नोटिफिकेशन जारी किया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह बढ़ोतरी संवैधानिक सीमा और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के निर्देशों के विपरीत है।
दो चरणों में हुई सुनवाई
मंगलवार को सुनवाई दो चरणों में हुई। पहले चरण में एक पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल दस्तावेजों का हवाला दिया। हालांकि उस समय सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट उपलब्ध नहीं हो सकी, जिस कारण हाईकोर्ट ने सुनवाई दोपहर बाद तक स्थगित कर दी।
बेंच ने रजिस्ट्री से पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट से मूल रिकॉर्ड प्राप्त हुआ है। लंच के बाद रजिस्ट्री ने बताया कि रिकॉर्ड अभी तक नहीं आया है। इसके बाद कोर्ट ने अगली सुनवाई 13 से 15 मई तय कर दी।
सरकार की ओर से कौन रखेगा पक्ष, स्पष्ट हुआ
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह ने सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव द्वारा जारी आदेश कोर्ट में पेश किया।
इस आदेश के अनुसार ओबीसी आरक्षण मामले में राज्य सरकार की ओर से केवल ये लोग पक्ष रखेंगे:
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज
- महाधिवक्ता प्रशांत सिंह
- महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी
पूर्व विशेष अधिवक्ता अब नहीं रखेंगे पक्ष
इस आदेश से यह भी स्पष्ट हो गया कि पूर्व में राज्यपाल द्वारा विशेष अधिवक्ता नियुक्त किए गए सीनियर एडवोकेट रामेश्वर सिंह ठाकुर और अधिवक्ता विनायक शाह अब राज्य सरकार की ओर से इस मामले में पैरवी नहीं करेंगे। दोनों की नियुक्ति 14 सितम्बर 2021 को मप्र शासन के सामान्य प्रशासन विभाग ने नियुक्त किया था। अशिता दुबे व ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामलों में पैरवी के हर पेशी के लिए उनकी फीस डेढ़-डेढ़ लाख रूपए भी तय की गई थी।
क्यों अहम है मामला
मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र रहा है। इस मामले का असर सरकारी नौकरियों, भर्ती परीक्षाओं और स्थानीय निकाय चुनावों सहित कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। अब सबकी नजर 13 से 15 मई की सुनवाई पर टिकी है, जहां मामले में महत्वपूर्ण कानूनी बहस होने की संभावना है।
