POCSO केस में रीवा में चल रहे ट्रायल पर मप्र हाईकोर्ट की टिप्पणी, निचली अदालत का आदेश पलटा
जबलपुर। Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO) के एक मामले में हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि “पुराने मामलों के शीघ्र निस्तारण” का मतलब यह नहीं कि आरोपी को अपना बचाव पेश करने का अवसर ही न दिया जाए। इस टिप्पणी के साथ जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की बेंच ने रीवा की अदालत के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमे आरोपी को अपने बचाव का मौका देने से इंकार कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने ये निर्देश रीवा के गढ़ थानांतर्गत ग्राम सरई में रहने वाले अविनाश पांडे की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर दिया। दरअसल, अविनाश के खिलाफ रीवा की अदालत में पॉक्सो का मामला चल रहा है। स्पेशल जज (POCSO Act), सिरमौर, जिला रीवा ने 28 अगस्त 2024 और 3 सितंबर 2024 को आरोपी अविनाश की उस अर्जी को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने फॉरेंसिक विशेषज्ञ समेत बचाव पक्ष के गवाहों को तलब करने की मांग की थी।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों खारिज की थी अर्जी?
ट्रायल कोर्ट ने कहा था कि आवेदन पहले क्यों नहीं दिया गया? डीएनए रिपोर्ट धारा 293 Cr.P.C. के तहत बिना औपचारिक साक्ष्य के स्वीकार्य है। यह मामला “सबसे पुराने 100 मामलों” में शामिल है, जिन्हें 6 माह में निपटाने के निर्देश हैं।
हाईकोर्ट ने कहा- मौका पाना वैधानिक आधार
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी डीएनए रिपोर्ट पर आपत्ति करता है और फॉरेंसिक विशेषज्ञ से जिरह करना चाहता है, तो यह उसका वैधानिक अधिकार है। केवल इस आधार पर अर्जी खारिज नहीं की जा सकती कि मामला पुराना है या रिपोर्ट स्वतः ग्राह्य है। कोर्ट ने कहा कि “Justice delayed is justice denied” के साथ यह भी याद रखना होगा कि “Justice hurried is justice buried।” यानी जल्दबाज़ी में न्याय करना, न्याय को दफनाने जैसा है।
किस फैसले का दिया गया था हवाला?
आरोपी की अर्जियां खारिज करके ट्रायल कोर्ट ने 11 सितम्बर 2023 को In reference vs. Anokhilal मामले पर दिए गए फैसले का हवाला दिया था, जिसमें पुराने मामलों के शीघ्र निस्तारण के निर्देश दिए गए थे। वहीं हाईकोर्ट ने कहा कि यह सामान्य निर्देश है, इसका अर्थ यह नहीं कि निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों से समझौता किया जाए।
