LAW'S VERDICT

किसी और अपराध में जेल गए, तो न कहलाओगे मीसा बंदी और न मिलेगी सम्मान निधि


कथित मीसा बंदी की पत्नी की याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला 

जबलपुर। मीसा (MISA) के तहत बंदी बने लोगों को मिलने वाली सम्मान निधि को लेकर मप्र हाईकोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। जस्टिस संदीप एन भट्ट की अदालत ने कहा है कि ये सम्मान निधि उन लोगों को मिलेगी जो राजनीतिक  या सामाजिक कारणों से जेल गए हों। यदि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी किसी और आपराधिक मामलों में हुई है, तो वह न तो  मीसा बंदी कहलाएगा और न ही उसे सम्मान निधि मिलेगी। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने एक कथित मीसा बंदी की पत्नी की याचिका का निराकरण कर दिया। 

 कथित मीसा बंदी ने लगाई थी याचिका 

पहले यह याचिका रीवा के बारा गाँव में रहने वाले उमाकांत उर्फ़ दादू सिंह की ओर से वर्ष 2012 में दाखिल हुई थी। उमाकांत का दावा था कि वो 29 अप्रैल 1976 से 22 जनवरी 1977 तक मीसा बंदी के रूप में जेल में रहे।  इस गिरफ्तारी के एवज में सम्मान निधि पाने दायर किया गया आवेदन 5 जनवरी 2012 को ख़ारिज होने पर यह याचिका दाखिल की गई थी। याचिका में प्रार्थना की गई थी कि राज्य सरकार को निर्देशित किया जाए कि वर्ष 2008 से लंबित सम्मान निधि (एम.पी.) का लाभ उन्हें ब्याज सहित देने के निर्देश सरकार को दिए जाएँ। इस संबंध में पहले भी एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें प्राधिकरण को मामले पर विचार करने के निर्देश मिले थे। हालाँकि उमाकांत के निधन के बाद इनकी पत्नी विमला सिंह इस मामले में याचिकाकर्ता बनीं।  

कलेक्टर ने पाया था आपराधिक रिकॉर्ड 

कलेक्टर ने उमाकांत उर्फ़ दादू सिंह का आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध तीन आपराधिक प्रकरण दर्ज थे। राज्य ने हाईकोर्ट में दिए जवाब में स्पष्ट किया कि लोक नायक जय प्रकाश (मीसा/डीआईआर व्यक्ति) सम्मान निधि नियम  2008 के नियम 6 के तहत केवल उन्हीं व्यक्तियों को लाभ मिल सकता है, जिन्हें राजनीतिक या सामाजिक कारणों से निरुद्ध किया गया हो और जिनका कोई आपराधिक इतिहास न हो। रिकॉर्ड के अनुसार 1976, 1988 और 1997 में विभिन्न धाराओं में उमाकांत पर मामले दर्ज थे। समिति की बैठक दिनांक 26.02.2009 में भी समान परिस्थितियों वाले अन्य आवेदनों को अस्वीकृत किया गया था। राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता कमल सिंह बाघे ने यह भी तर्क दिया कि नियम 8 के तहत कलेक्टर के आदेश के विरुद्ध राज्य सरकार के समक्ष अभ्यावेदन का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, जिसका उपयोग नहीं किया गया।

मीसा में गिरफ्तारी साबित ही नहीं 

सुनवाई के बाद दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का 28 नवंबर 2012 को निधन हो चुका है और उनकी पत्नी अब लाभ की मांग कर रही हैं। कोर्ट ने माना कि योजना में पारिवारिक सदस्य को लाभ का प्रावधान है, लेकिन पहले यह साबित होना आवश्यक है कि गिरफ्तारी, राजनीतिक या सामाजिक कारणों से हुई हो। उपलब्ध दस्तावेजों से स्पष्ट है कि संबंधित अवधि में याचिकाकर्ता आपराधिक मामलों के कारण जेल में थे, न कि किसी राजनीतिक आंदोलन के कारण। इसलिए प्राधिकरण द्वारा दावा खारिज करना मनमाना या अवैध नहीं कहा जा सकता। हालाँकि अदालत ने याचिकाकर्ता को यह राहत जरूर दी है  यदि चार सप्ताह के भीतर नियम 8 के तहत अभ्यावेदन प्रस्तुत किया जाता है, तो सक्षम प्राधिकारी विधि के अनुसार उस पर विचार करेगा।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP-19632-2012

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