LAW'S VERDICT

दमोह नगर पालिका के वार्ड 39 से घटाकर 29 करने पर हाईकोर्ट की मुहर, बदलेंगे चुनावी समीकरण


वार्डों के पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली नपा अध्यक्ष की याचिका खारिज 

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने दमोह नगर पालिका के वार्ड पुनर्निर्धारण को चुनौती देने वाली नपा अध्यक्ष और एक समाजसेवी की याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस विशाल मिश्रा की कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 39 वार्डों को घटाकर 29 करने की पूरी प्रक्रिया वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है और इसमें किसी प्रकार की अवैधता नहीं पाई गई। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद दमोह नगर निगम के आगामी चुनावों से पहले वार्ड पुनर्सीमांकन को कानूनी वैधता मिल गई है, जिससे स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है।

अध्यक्ष सहित 2 ने लगाई थी याचिका 

यह याचिका दमोह नगर पालिका की अध्यक्ष मंजू राय और समाजसेवी शैलेन्द्र सिंह ने दाखिल करके वार्डों के फिर से सीमांकन के सम्बन्ध में 15 दिसंबर 2025 के प्रस्ताव और 17 दिसंबर 2025 के नोटिस पर सवाल उठाये थे। पुनर्सीमांकन के तहत कुछ वार्डों का विलय किया गया, कई सीमाएं बदली गईं और लगभग आसपास के 12 गांवों को नगर पालिका में शामिल किया गया। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि यह कार्रवाई M.P. Municipalities (Extent of Wards) Rules, 1994 के नियम 6(1) का उल्लंघन है। उनका कहना था कि नोटिस सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं किया गया और वार्ड नंबर 2 सहित कुछ वार्डों में जनसंख्या असंतुलन गंभीर है।

आंकड़े जुटाकर विधि अनुसार अपनाई प्रक्रिया: सरकार 

राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता प्रभांशु शुक्ला की दलील थी कि पूरी प्रक्रिया मप्र नगर पालिक निगम अधिनियम, 1961 की धारा 29 के तहत शुरू की गई। कलेक्टर के आदेशों के बाद राजस्व एवं पंचायत अमले से आंकड़े जुटाए गए, प्रारंभिक अधिसूचना जारी की गई और आम जनता से आपत्तियां आमंत्रित की गईं। आपत्तियों पर विधिवत विचार करने के बाद ही आगे की कार्रवाई की गई।

कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करके पाया कि नोटिस जारी करने से पहले सक्षम अधिकारी की स्वीकृति ली गई थी। नियम 6, 7 और 8 के तहत प्रारंभिक अधिसूचना, आपत्तियों का आमंत्रण और उनका परीक्षण जैसी आवश्यक प्रक्रिया सही तरीके से अपनाई गई। अदालत ने यह भी माना कि जब प्रक्रिया विधिसम्मत हो तब केवल वार्डों की संख्या में कमी या सीमांकन में बदलाव अपने आप में अवैध नहीं होता। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में उठाए गए आधार निराधार हैं और किसी प्रकार की अधिकार-क्षेत्र संबंधी त्रुटि या प्रक्रिया की कमी सिद्ध नहीं होती। परिणामस्वरूप, याचिका को निरस्त कर दिया गया।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  WP-1618-2026



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