LAW'S VERDICT

मदन महल पुलिस के कथित फर्जी NDPS केस में IG की अधूरी जांच रिपोर्ट पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

 IG की ओर से पेश रिपोर्ट को हाईकोर्ट ने सीलबंद लिफ़ाफ़े में सुरक्षित रखने कहा 

जबलपुर। मदन महल थाना में एक युवती के खिलाफ दर्ज किये गए NDPS के मामले में बड़ा मोड़ आया है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने पुलिस महानिरीक्षक (IG) द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट पर असंतोष जताते हुए कहा कि रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल नहीं किए गए। मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ में हुई। अदालत ने आईजी की रिपोर्ट को एक साल के लिए सीलबंद लिफ़ाफ़े में सुरक्षित रखने कहा है।

युवती ने लगाए हैं पुलिस पर आरोप 

यह प्रकरण खुशी कौर नामक उस युवती ने दाखिल किया है, जिसे मदन महल थाना पुलिस ने 11 जनवरी 2026 को NDPS एक्ट की धारा 8/20 के तहत गिरफ्तार किया था। बचाव पक्ष का आरोप है कि ट्रेन यात्रा के दौरान अभद्र व्यवहार का विरोध करने पर उन्हें जबरन थाने लाकर मादक पदार्थ रखने के झूठे आरोप में फंसाया गया। इसके साथ ही मोबाइल फोन और निजी सामान गायब करने के आरोप भी लगाए गए। 

कोर्ट ने दिए थे निष्पक्ष जांच के आदेश 

सुनवाई के दौरान CCTV फुटेज में विरोधाभास, यात्रा (रायपुर से जबलपुर) के घटनाक्रम में अस्पष्टता, जब्ती और गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर सवाल सामने आए थे। इन्हीं पहलुओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने पूर्व में IG को निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए थे। युवती की ओर से अधिवक्ता सौरभ कुमार शर्मा और विकास कुमार संटू ने पैरवी की।   

जांच से कई अहम पहलू गायब  

आईजी की ओर से पेश की गई ताजा रिपोर्ट देखकर अदालत ने पाया कि इसमें कई महत्वपूर्ण भौतिक तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। आवेदिका द्वारा उठाए गए प्रमुख बिंदुओं पर पर्याप्त जांच नहीं की गई। पूर्व में आवेदन के निपटारे में अधूरी जानकारी कारण रही हो सकती है। हालांकि निचली अदालत में ट्रायल लंबित होने के कारण हाईकोर्ट ने विस्तृत टिप्पणी से परहेज किया।

रिपोर्ट सुरक्षित रखने के आदेश

सुनवाई के बाद अदालत ने IG की जांच रिपोर्ट को रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष सीलबंद लिफाफे में सुरक्षित रखने का आदेश। रिपोर्ट कम से कम एक वर्ष तक अभिरक्षा में रखी जाएगी। इसके साथ ही अदालत ने मामले की कार्यवाही फिलहाल समाप्त कर दी। यह मामला भले ही तकनीकी रूप से इस चरण में समाप्त हुआ हो, लेकिन पुलिस जांच की विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर उठे सवाल अभी भी कायम हैं।

हाईकोर्ट का आदेश देखें   MCRC-4158-2026

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