न्यायिक कर्मियों के वेतनमान मामले पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, सरकार को रिपोर्ट पेश करने कहा
जबलपुर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के उच्च वेतनमान का लाभ देने के मामले पर हाईकोर्ट ने मंगलवार को कड़ा रुख अपनाया है। एक अवमानना मामले पर जस्टिस डीडी बंसल की बेंच ने पूछा कि हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का परिपालन हुआ है या नहीं ? सरकार की ओर से कहा गया कि मामला कैबिनेट तक गया है, लेकिन उसके दस्तावेज गोपनीय होने के कारण रिकॉर्ड पर पेश नहीं किये गए। इस बयान पर जस्टिस बंसल ने कडा रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसा कौन सा क़ानून है, जिसकी वजह से कागज कोर्ट में पेश नहीं किये जा सकते। कोर्ट ने सरकार को कहा है कि कर्मचारियों के वेतनमान को लेकर दिए गए आदेश का पालन करके रिपोर्ट पेश की जाए। ऐसा नहीं होता तो यह आदेश की अवमानना होगी। कोर्ट के स्पष्ट निर्देश पर सरकार ने रिपोर्ट पेश करने और दस्तावेज रिकॉर्ड पर उपलब्ध कराने समय माँगा। अदालत ने सरकार को समय देते हुए अगली सुनवाई 10 मार्च को निर्धारित की है।
2016 से लंबित है मामला
गौरतलब है कि हाईकोर्ट के कर्मचारी किशन पिल्लई व 108 अन्य ने वर्ष 2016 में याचिका दायर कर उच्च वेतनमान का लाभ न दिए जाने को चुनौती दी थी। अदालत ने 28 अप्रैल 2017 को आदेश पारित करते हुए कहा था कि राज्य सरकार के पास यह मामला 27 जून 2015 से लंबित है, अतः चार सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय लिया जाए। निर्देशों का पालन न होने पर वर्ष 2018 में यह अवमानना याचिका दायर की गई थी, जिस पर वर्तमान में सुनवाई चल रही है।
तो यह अवमानना होगी
सोमवार को हुई सुनवाई में न्यायिक कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ और अधिवक्ता हिमान्शु मिश्रा उपस्थित रहे। वहीं राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रम्हदत्त सिंह ने पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अवमानना मामले का सीधा कांसेप्ट है। हाईकोर्ट के आदेश के पालन करने सरकार ने क्या कार्रवाई की, उसका ब्यौरा कोर्ट में पेश होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो वह अवमानना होगी। इस पर सरकार की ओर से कार्रवाई का ब्यौरा पेश करने समय चाहा गया, जिसके मद्देनजर अदालत ने सुनवाई मुल्तवी कर दी।
चीफ सेक्रेटरी हो चुके हैं हाजिर
इस मामले पर 24 मार्च 2025 को हुई सुनवाई के दौरान चीफ सेक्रेटरी अनुराग जैन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये हाईकोर्ट में हाजिर हुए थे। उस दिन सरकार की ओर से कहा गया था कि 28 अप्रैल 2017 के क्रियान्वयन के लिए राज्यपाल की स्वीकृति अनिवार्य है। इस बयान पर हाईकोर्ट ने सरकार को मामले पर ब्यौरा पेश करने कहा था।
