ST जाति के फर्जी प्रमाणपत्र से फार्मासिस्ट बने दो उम्मीदवारों की अपील खारिज, FIR पर रोक से हाईकोर्ट का इंकार
ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति (ST) के फर्जी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर फार्मासिस्ट बने दो उम्मीदवारों को राहत देने से इंकार करके उनकी ओर से दाखिल रिट अपीलें खारिज कर दी हैं। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस अनिल वर्मा की डिवीज़न बेंच कहा है कि जब सिंगल जज ने आपराधिक अधिकारिता (धारा 482 CrPC) के तहत आदेश पारित किया है, तो उसके खिलाफ रिट अपील पर सुनवाई नहीं की जा सकती। बेंच ने यहाँ तक कहा कि दोनों रिट याचिकाएं मूल रूप से FIR के पंजीयन और उसके बाद शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने के उद्देश्य से दायर की गई थीं। जब मामला आपराधिक जांच से संबंधित हो, तो उचित वैधानिक उपाय दंड प्रक्रिया संहिता के तहत ही अपनाया जाना चाहिए, न कि रिट या अपील जैसे क्षेत्राधिकार के माध्यम से अप्रत्यक्ष राहत प्राप्त की जाए। FIR पर रोक की आड़ में आरोपी को अग्रिम जमानत जैसी राहत नहीं दी जा सकती।
फर्जी जाति प्रमाण पत्र से हुई थी नियुक्ति
मामला ग्वालियर के एसडीओ द्वारा जारी मांझी (अनुसूचित जनजाति) जाति प्रमाणपत्र से जुड़ा है। इसी प्रमाणपत्र के आधार पर याचिकाकर्ता महेंद्र सिंह बाथम और हेमंत बाथम को 16 मार्च 2016 को लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग में फार्मासिस्ट ग्रेड–II के पद पर शिवपुरी में नियुक्ति मिली थी। नियुक्ति ST वर्ग की आरक्षित सीट पर हुई थी। बाद में एक शिकायत के आधार पर जांच शुरू हुई और वर्ष 2025 में आरोपी के खिलाफ IPC की धाराएं 420, 468, 471 और 120-B के तहत अपराध दर्ज किया गया। पुलिस जांच शुरू होने के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में FIR रद्द करने की मांग की थी।
सिंगल बेंच से नहीं मिली राहत
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 28 जनवरी 2026 को FIR रद्द करने से इंकार कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय (खंड न्यायपीठ को अपील) अधिनियम, 2005 की धारा 2(1) के तहत रिट अपील दायर की।
आपराधिक मामलों में रिट अपील मान्य नहीं
अपने फैसले में डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिका मूल रूप से आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने वाली थी। भले ही याचिका अनुच्छेद 226 के तहत दायर की गई हो, लेकिन उसका स्वरूप धारा 482 CrPC के अंतर्गत था। ऐसे मामलों में सिंगल जज के आदेश के खिलाफ रिट अपील मान्य नहीं होती। अदालत ने पूर्व में Pradeep Kori Vs State of M.P., 2020(4) मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक प्रकृति के आदेशों पर रिट अपील नहीं की जा सकती।
अग्रिम जमानत जैसा लाभ नहीं मिल सकता
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि जांच पर रोक लगा दी जाती तो यह आदेश अग्रिम जमानत जैसा प्रभाव उत्पन्न करता। इस मत के साथ डिवीज़न बेंच ने किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने से इंकार करके दोनों अपीलें खारिज कर दीं। शासन की और से अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेड़कर ने पैरवी की।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WRIT APPEAL NO. 450 of 2026
