मस्जिद-मुसाफिरखाना विवाद में हाईकोर्ट ने ख़ारिज की याचिका, तीन दिन में बेदखली के आदेश को दी थी चुनौती
कमेटी का दावा: 1967 से है कब्जा
याचिकाकर्ता मस्जिद सदर अंजुमन इस्ला उल मुस्लिमीन के एग्जीक्यूटिव अफसर साबिर हासमी की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया था कि वो एक पंजीकृत वक्फ कमेटी है, जो Waqf Act, 1995 के तहत गठित है। कमेटी का कहना था कि सर्वे नंबर 12, रकबा 30,400 वर्गफुट भूमि वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज है। 1981 में अर्बन लैंड सीलिंग प्राधिकरण से NOC मिला। 1994 में प्रशासन ने मस्जिद और मुसाफिरखाना निर्माण पर आपत्ति नहीं जताई। 1997 और 2003 में नगर निगम से बिल्डिंग परमिशन मिली। सेंट्रल वक्फ काउंसिल ने 80 लाख रुपये का ऋण स्वीकृत किया। कमेटी का तर्क था कि तहसीलदार को वक्फ संपत्ति पर आदेश देने का अधिकार नहीं, यह मामला वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आता है।
सरकार बोली: “लंबे कब्जे से मालिकाना हक नहीं मिलता”
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव की दलील थी कि संबंधित भूमि ब्लॉक नंबर 6, 11 और 12 मिलाकर 40,000 वर्गफुट है। राजस्व रिकॉर्ड में यह स्पष्ट रूप से सरकारी नज़ूल भूमि दर्ज है। केवल लंबे समय से कब्जा या NOC होने से भूमिस्वामी अधिकार (Section 158 MPLRC) स्वतः नहीं मिल जाते। इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता द्वारा जमीन का कोई मूल स्वामित्व दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा- यह कोर्ट fact-finding का मंच नहीं
सुनवाई के बाद मामले पर सुरक्षित रखा फैसला सुनाते हुए जस्टिस पिल्लई की कोर्ट ने कहा यह मामला टाइटल, स्वामित्व और सीमांकन जैसे जटिल तथ्यों से जुड़ा है। रिट याचिका (Article 226) के तहत अदालत तथ्य जांच (fact-finding) का मंच नहीं है। तहसीलदार का आदेश MPLRC के तहत अपील योग्य है। ऐसे में याचिकाकर्ता कानून में मौजूद वैकल्पिक वैधानिक उपाय (अपील/ट्रिब्यूनल/सिविल कोर्ट में अपना मामला दाखिल कर सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रिट के माध्यम से स्वामित्व की घोषणा नहीं कराई जा सकती। इसके साथ ही अदालत ने मस्जिद सदर अंजुमन इस्ला उल मुस्लिमीन के एग्जीक्यूटिव अफसर साबिर हासमी की ओर दायर याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट का आदेश देखें W.P. No. 7146/2026
