STF केस में फंसे 3 B.Ed कॉलेजों की याचिकाएं खारिज कर HC ने 25-25 हजार का जुर्माना भी ठोका
ग्वालियर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने B.Ed. कॉलेजों की संबद्धता (Affiliation) से जुड़े मामले में सख्त रुख अपनाते हुए STF द्वारा दर्ज आपराधिक मामलों में फंसे 5 कॉलेजों को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस आनंद सिंह बेहरावत की डिवीजन बेंच ने इन संस्थानों को “शिक्षा के नाम पर चल रही कमर्शियल दुकानें” बताते हुए तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं और प्रत्येक कॉलेज पर ₹25,000 का जुर्माना भी लगाया है।
हाईकोर्ट में ये 3 याचिकाएं श्योपुर के स्व. सुरेंद्र प्रताप शिक्षा समिति द्वारा संचालित प्रताप कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन, ग्वालियर के स्व. सर्वती देवी मेमोरियल शिक्षा प्रसार एवं जन कल्याण समिति व विद्यासुधा वेलफेयर फाउंडेशन ग्वालियर और श्रीमती श्यामा देवी दीनदयाल बहुउद्देशीय प्रचार प्रसार समिति ग्वालियर द्वारा संचालित माँ सरस्वती शिक्षा श्योपुर व सिटी पब्लिक कॉलेज अशोकनगर की ओर दाखिल किये गए थे । वहीं 3 याचिकाएं छात्रों की ओर से दाखिल की गईं थीं। इन सभी याचिकाओं में याचिकाकर्ता संस्थानों ने शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए B.Ed. कोर्स की संबद्धता बहाल करने और काउंसलिंग में शामिल करने की मांग की थी।
क्या था मामला
याचिकाकर्ता तीनों कॉलेजों को NCTE से वर्ष 2017 में मान्यता प्राप्त थी और वर्ष 2024-25 तक विश्वविद्यालय से संबद्धता भी मिलती रही। सत्र 2025-26 के लिए जीवाजी विश्वविद्यालय ने 02 जुलाई 2025 के आदेश से संबद्धता रोक दी। इसके लिए STF भोपाल द्वारा IPC की गंभीर धाराओं (420, 467, 468, 471, 120-B) में आपराधिक प्रकरण, STF 8 मई 2025 का पत्र, स्टैंडिंग कमेटी की नकारात्मक अनुशंसा और NCTE से भेजे गए कथित संदिग्ध पत्र की सत्यता पर संदेह आधार बने।
कॉलेजों की दलील
कॉलेजों की ओर से कहा गया कि NCTE की मान्यता होने के बाद विश्वविद्यालय संबद्धता रोक नहीं सकता, और केवल आपराधिक मामला दर्ज होना संबद्धता का आधार नहीं हो सकता। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध करके उनकी याचिकाएं ख़ारिज करने की मांग हाईकोर्ट से की।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
कोर्ट ने कॉलेजों की इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे संस्थानों को संबद्धता देना जनहित के खिलाफ है। जांच के दौरान NCTE का कथित पत्र संदिग्ध पाया गया। याचिकाकर्ताओं ने जानबूझकर NCTE को पक्षकार नहीं बनाया, ताकि सच्चाई सामने न आए। बेंच ने कहा कि इस मामले में विश्वविद्यालय ने सही और जिम्मेदाराना निर्णय लिया। डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के Adarsh Shiksha Mahavidyalaya, LBS B.Ed. College सहित कई निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि मान्यता और संबद्धता दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और दोनों में नियमों का पालन अनिवार्य है।
छात्रों को भी राहत नहीं
3 याचिकाएं छात्रों के नाम से दायर की गई थीं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि गलत कॉलेज चुनने पर सहानुभूति नहीं दी जा सकती। छात्रों को केवल फीस रिफंड का अधिकार है, कोर्स जारी रखने का नहीं।
NCTE को भी फटकार
हाईकोर्ट ने NCTE को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उसे अपने सिस्टम में सुधार करना होगा और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो धारा 17 के तहत मान्यता वापस लेने की कार्रवाई करनी चाहिए।
सभी याचिकाएं खारिज
डिवीजन बेंच ने प्रत्येक कॉलेज पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया और उनके छात्रों को परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से इंकार करके सभी ६ याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही याचिकाकर्ताओं के पक्ष में पहले दिए गए सभी अंतरिम आदेश को भी निरस्त किया गया।
हाईकोर्ट का आदेश देखें W.P.Nos.26738/2025
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