मप्र हाईकोर्ट ने ANM की याचिका खारिज कर सुनाया अहम फैसला
ग्वालियर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामले में बरी होने के बाद भी सरकारी कर्मचारी को सस्पेंशन अवधि का पूरा वेतन और भत्ते स्वतः नहीं मिल सकते। जस्टिस आशीष श्रोती की सिंगल बेंच ने एक एएनएम की याचिका खारिज करते हुए राज्य शासन के आदेश को सही ठहराया है। कोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी के कारण निलंबन अनिवार्य था और विभाग की कोई गलती नहीं थी। इसलिए सस्पेंशन अवधि का वेतन-भत्ता देना आवश्यक नहीं है।
गिरफ्तारी के बाद हुआ था निलंबन
याचिकाकर्ता श्रीमती छोटी देवी तोमर, जिला मुरैना के पोरसा स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंतर्गत उप-स्वास्थ्य केंद्र बड़ापुरा में एएनएम पद पर पदस्थ थीं। उनके खिलाफ महुआ थाने में आईपीसी की धारा 307 सहित अन्य धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज हुआ था। गिरफ्तारी के बाद 1 सितंबर 1999 को उन्हें निलंबित कर दिया गया। 18 नवंबर 2005 को ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए 5 वर्ष की सजा सुनाई थी। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने 23 मार्च 2017 को आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए उन्हें बरी कर दिया।
सेवानिवृत्ति के बाद उठाया वेतन का मुद्दा
अपील लंबित रहने के दौरान ही 31 अगस्त 2016 को वे सेवानिवृत्त हो गईं। बरी होने के बाद उन्होंने सस्पेंशन अवधि (1/9/1999 से 30/8/2016) को नियमित मानते हुए पूरा वेतन और भत्ते तथा ब्याज देने की मांग की। राज्य सरकार ने 25 जनवरी 2019 के आदेश में सस्पेंशन अवधि को सेवा में माना, लेकिन वेतन-भत्तों का लाभ देने से इनकार कर दिया।
