LAW'S VERDICT

सुको ने कहा- जज सजा के भय में काम करेंगे तो संभव नहीं होगा निष्पक्ष न्याय

मध्यप्रदेश के जज निर्भय सिंह सुलिया की बर्खास्तगी खारिज 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक जवाबदेही और न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि केवल गलत या त्रुटिपूर्ण फैसले के आधार पर किसी जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई या सजा नहीं दी जा सकती। जजमेंट एरर (Judgment Error) और भ्रष्टाचार को एक समान मानना न्याय व्यवस्था के लिए घातक होगा। इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केबी विश्वनाथन ने कहा- 27 वर्षों तक बेदाग़ सेवा देने वाले जज को बिना किसी due process के नौकरी से हटाना न्यायसंगत नहीं है। बेंच ने सुलिया की बर्खास्तगी को अवैध ठहराकर उसे निरस्त कर दिया है।
मामला मध्यप्रदेश के न्यायिक अधिकारी निर्मल सिंह सुलिया से जुड़ा है, जिनकी बर्खास्तगी को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के आदेश में त्रुटि है, तो उसका उपचार अपील या पुनरीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि सीधे दंडात्मक कार्रवाई से।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अधिकारी यदि ईमानदारी से, विवेक और कानून की समझ के आधार पर आदेश पारित करता है, तो केवल इस आधार पर कि आदेश गलत है, उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई तभी उचित है जब दुर्भावना, भ्रष्टाचार, या जानबूझकर कानून के दुरुपयोग के ठोस साक्ष्य मौजूद हों।
फैसले में कहा गया कि न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने वाली कार्रवाई से न्याय व्यवस्था पर आम जनता का विश्वास डगमगा सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि जज हर फैसले के लिए सजा के भय में काम करेंगे, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय संभव नहीं रहेगा।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार या गंभीर अनियमितता प्रमाणित होती है, तो सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई से पीछे नहीं हटना चाहिए।
यह फैसला देशभर के न्यायिक अधिकारियों के लिए एक मजबूत संदेश माना जा रहा है, जिसमें न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

क्या था मामला: खरगोन में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया ने 50 बल्क लीटर से अधिक शराब जब्ती के कुछ मामलों में  आरोपियों को जमानत दी थी। विभागीय जांच के बाद मप्र हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 में सुलिया को बर्खास्त कर दिया था। बर्खास्तगी के मामले में मप्र हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया गया ।

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