मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा जिला न्यायालयों में 1255 विभिन्न पदों पर की गई भर्ती प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के 19 दिसंबर 2025 के फैसले के आलोक में हाईकोर्ट की डिविजन बेंच द्वारा दो वर्ष पूर्व पारित निर्णय में सुधार की मांग को लेकर याचिका दायर की गई है।
यह मामला आरक्षित वर्ग के उन 300 से अधिक अभ्यर्थियों से जुड़ा है, जिन्होंने अनारक्षित वर्ग की कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए, इसके बावजूद उन्हें असफल घोषित कर मुख्य (टाइपिंग) परीक्षा में शामिल होने से वंचित कर दिया गया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर के अनुसार, परीक्षा के प्रथम एवं द्वितीय चरण में मेरिट के आधार पर आरक्षित वर्ग से अनारक्षित वर्ग में माइग्रेशन (चयन) के मुद्दे पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिविजन बेंच द्वारा याचिका क्रमांक WP/8750/22 सहित लगभग दो दर्जन याचिकाओं में दिया गया फैसला त्रुटिपूर्ण है।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में अनारक्षित वर्ग की कट-ऑफ 78 अंक और ओबीसी वर्ग की 88 अंक को सही ठहराते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया गलत माना है।
राजस्थान हाईकोर्ट केस बना नजीर
सुप्रीम कोर्ट ने Civil Appeal No. 14112/2024 (Rajasthan High Court बनाम Rajat Yadav & Ors.) में स्पष्ट किया कि राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा 2756 पदों की भर्ती में अनारक्षित वर्ग की कट-ऑफ 196 अंक और ओबीसी की 230 अंक निर्धारित करना असंवैधानिक व आरक्षण विरोधी है।
राजस्थान हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने ऐसे सभी चयन निरस्त करने के निर्देश दिए, जिनमें कम अंक पाने वालों को चयनित किया गया था, और नए सिरे से संवैधानिक तरीके से परिणाम बनाने को कहा।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर आरोप
प्रेस नोट में आरोप लगाया गया है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की भर्ती सेल वर्षों से “रिवर्स रिजर्वेशन” लागू कर रही है, जिसमें 50% अनारक्षित पदों को व्यवहारिक रूप से केवल सामान्य वर्ग के लिए सीमित कर दिया जाता है। यही विवाद सिविल जज भर्ती परीक्षा 2022 में भी सामने आया है।
जब भी इस त्रुटि को सुधारने के लिए ज्ञापन दिए जाते हैं, तो पूर्व न्यायमूर्ति शील नागू की डिविजन बेंच द्वारा दिए गए WP/8750/22 के फैसले का हवाला देकर मांगों को खारिज कर दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस सुजय पाल की डिविजन बेंच द्वारा दिए गए निर्णय (किशोर चौधरी बनाम म.प्र. शासन) को सही ठहराते हुए इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ, दीपेंद्र यादव बनाम MPPSC सहित कई ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया।
शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि—
“अनारक्षित पद किसी जाति विशेष के लिए आरक्षित नहीं किए जा सकते। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत पहले उन सभी अभ्यर्थियों का चयन होगा, जिन्होंने अनारक्षित वर्ग की कट-ऑफ के बराबर अंक प्राप्त किए हैं, चाहे वे किसी भी वर्ग से हों।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि न्यायपालिका स्वयं संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करेगी, तो नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा।