आय का गलत आकलन कर दी गई थी अभियोजन स्वीकृति, भ्रष्टाचार केस की संपूर्ण कार्यवाही की रद्द
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दिए गए प्रोसिक्यूशन सैंक्शन आदेश को अवैध और मनमाना करार देते हुए रद्द कर दिया है। जस्टिस विवेक कुमार सिंह और जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की डिवीजन बेंच ने कहा कि सरकारी अधिकारी की पत्नी की स्वतंत्र और वैध आय को अनदेखा कर उस कमाई को पति की आय मानना कानूनन गलत है। डिवीज़न बेंच का यह फैसला उन मामलों में मील का पत्थर माना जा रहा है, जहां सरकारी कर्मचारी की पत्नी की स्वतंत्र आय को गलत तरीके से जोड़कर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं।
क्या था पूरा मामला
याचिकाकर्ता आलोक कुमार खरे सहायक आयुक्त, आबकारी, इंदौर के पद पर पदस्थ थे। लोकायुक्त को 20 जून 2018 को प्राप्त शिकायत के आधार पर 15 अक्टूबर 2019 को उनके यहाँ छापा कार्रवाई की गई। जांच अवधि वर्ष 1998 से 2019 तक निर्धारित की गई। लोकायुक्त ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता की संपत्ति 88.20% अधिक है और इसी आधार पर भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराओं में अभियोजन स्वीकृति दी गई। याचिकाकर्ता मीनाक्षी खरे और आलोक कुमार खरे ने इस याचिका में लोकायुक्त की अनुशंसा पर 04 अप्रैल 2025 को जारी प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रकाश उपाध्याय, अधिवक्ता सिद्धार्थ शर्मा, शुभम मँछानी ने पैरवी की।
पत्नी की आय को लेकर बड़ा सवाल
कोर्ट के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता मीनाक्षी खरे विवाह से पूर्व से अधिवक्ता हैं और नियमित रूप से आयकर रिटर्न दाखिल कर रही थीं। कृषि भूमि खरीदकर वो कृषि व बागवानी से वैध आय अर्जित कर रही थीं। सारी आय और संपत्ति आयकर विभाग व विभागीय घोषणाओं में दर्ज थी। इसके बावजूद, जांच एजेंसी ने पत्नी की कृषि और पेशेवर आय को शून्य मानते हुए उसे पति की आय में जोड़ दिया।
एक्साइज कमिश्नर की रिपोर्ट भी अनदेखी
मामले में आबकारी आयुक्त की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया था कि ₹37.97 लाख (वकालत से आय), ₹4.60 करोड़ (कृषि आय) गलत तरीके से घटाई गई है। रिपोर्ट के अनुसार कुल आय व्यय से अधिक थी, और यह सैंक्शन देने योग्य मामला नहीं था, फिर भी सक्षम प्राधिकारी ने इस रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया।
पत्नी की स्वतंत्र पहचान को नकारा गया
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पत्नी की स्वतंत्र पेशेवर पहचान को नकारा गया। सैंक्शन देने वाला प्राधिकारी स्वतंत्र रूप से विवेक का प्रयोग करने में विफल रहा। जब कथित अनुपातहीन संपत्ति 10% से कम हो, तो अभियोजन टिकाऊ नहीं माना जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने 4 अप्रैल 2025 को दी गई अभियोजन की मंजूरी और उसके आधार पर की गईं सभी कार्रवाई खारिज कर दीं।
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