मप्र हाईकोर्ट की याचिका पर शीर्ष अदालत ने कहा- सिविल जज का आचरण घिनौना था
नई दिल्ली। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है, जिसमे चलती ट्रेन में एक महिला यात्री के सामने पेशाब करने वाले सिविल जज नवनीत सिंह यादव की बहाली के आदेश दिए गए थे। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डिवीज़न बेंच ने सिविल जज के इस कृत्य को घोर दुराचार निरूपित कर कहा कि ऐसे मामलों में बहाली नहीं बल्कि बर्खास्तगी होनी चाहिए थी।
यह मामला वर्ष 2018 का है, जब एक सिविल जज (क्लास-II) पर ट्रेन यात्रा के दौरान महिला यात्री के सामने अत्यंत अशोभनीय आचरण करने के आरोप लगे थे। घटना के बाद रेलवे पुलिस ने संबंधित न्यायिक अधिकारी को गिरफ्तार किया था, हालांकि बाद में जमानत मिलने के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया।
रेलवे कोर्ट से बरी, विभागीय जांच में आरोप साबित
घटना 17 जून 2018 की देर रात की है। डिंडोरी जिले के शाहपुरा में सिविल जज क्लास-2 के पद पर पदस्थ नवनीत सिंह यादव ओवरनाइट एक्सप्रेस में सफर कर रहे थे। उन पर आरोप लगा था कि वे नशे की हालत में थे और चलती ट्रेन के टॉयलेट में उन्होंने एक महिला तारी के सामने पेशाब की। यात्रियों की शिकायत पर उन्हें हिरासत में लिया गया , लेकिन अपराध जमानती होने के कारण उन्हें जमानत पर रिहा किया गया। रेलवे मजिस्ट्रेट कोर्ट, जबलपुर ने साक्ष्यों के अभाव में मार्च 2019 में सिविल जज नवनीत सिंह यादव को आपराधिक मामले में बरी कर दिया था। लेकिन दूसरी ओर, हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा कराई गई विभागीय जांच में आरोप सिद्ध पाए गए। कई गवाहों ने अशोभनीय आचरण की पुष्टि की, जिसके आधार पर पद के दुरुपयोग और लोक सेवक के रूप में गरिमा भंग करने के आरोप सही पाए गए। इसके बाद सितंबर 2019 में राज्यपाल के आदेश से न्यायिक अधिकारी की सेवा समाप्त कर दी गई थी।
हाईकोर्ट ने दिया था बहाली का आदेश
हाल ही में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की तत्कालीन डिवीजन बेंच ने 6 मई 2025 को सिविल जज नवनीत सिंह यादव की याचिका पर फैसला सुनाते हुए बर्खास्तगी को रद्द करके उसकी बहाली के आदेश दिए थे। इसी आदेश को हाईकोर्ट प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि यह मामला न्यायपालिका की छवि से जुड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक महिला की उपस्थिति में इस तरह का आचरण न्यायिक सेवा में स्वीकार्य नहीं हो सकता। पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में नरमी दिखाना गलत संदेश देता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर तत्काल रोक लगाते हुए न्यायिक अधिकारी और राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब तलब किया है।
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