LAW'S VERDICT

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: मप्र में 200 की स्पीड से कार कौन चलाता है?



स्पीड को लेकर कार कंपनी का दावा पूरा न होने पर ग्राहक ने लगाई थी हाईकोर्ट में याचिका  

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कार निर्माताओं द्वारा वाहनों की अत्यधिक स्पीड को लेकर किए जाने वाले दावे से सम्बंधित मामला खारिज कर दिया है। भोपाल के एक व्यवसायी ने हाईकोर्ट में मामला दाखिल कर कहा था कंपनी के 180-200  किमी का दावा था ,  लेकिन कार 100-120 किमी से ज्यादा नहीं भाग रही। इस दावे पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच को कहना पड़ा कि मप्र में ऐसी कौन सी सड़क है ,  जहाँ 180 से 200 की स्पीड पर कार चलाई जा सके।   

उपभोक्ता ने कंपनी के स्पीड दावे को दी थी चुनौती

यह मामला भोपाल के व्यवसायी मोहम्मद तारिक इरशाद द्वारा दायर किया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने 2 जुलाई 1998 को मारुति सुजुकी इंडिया की जिप्सी (किंग एसटी) खरीदी थी। कंपनी की ओर से दावा किया गया था कि वाहन की अधिकतम स्पीड 180 से 200 किमी प्रति घंटा है, लेकिन कार 100–120 किमी प्रति घंटे से अधिक की गति नहीं पकड़ पा रही थी।

स्पीड को लेकर शिकायत किए जाने के बावजूद कंपनी की ओर से कोई समाधान नहीं मिलने पर उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता फोरम का रुख किया। प्रारंभिक स्तर पर मामला खारिज होने के बाद राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर की गई।

राज्य आयोग का आदेश और आगे की कार्रवाई

राज्य आयोग ने आदेश दिया था कि 30 दिनों के भीतर वाहन की खामी दूर की जाए, अन्यथा कंपनी पूरी राशि 6 प्रतिशत ब्याज के साथ उपभोक्ता को वापस करे।

इस आदेश के खिलाफ कंपनी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में याचिका दाखिल की, लेकिन वह भी खारिज हो गई। इसके बाद आदेश के निष्पादन (एग्जीक्यूशन) में कथित बाधा को चुनौती देते हुए यह मामला हाईकोर्ट में लाया गया।


हाईकोर्ट का रुख

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने कहा कि यह विवाद उपभोक्ता कानून से संबंधित है। यदि राज्य आयोग के आदेश का निष्पादन नहीं हो पा रहा है, तो याचिकाकर्ता को पुनः वहीं आवेदन करना चाहिए।

सीधे हाईकोर्ट में दायर याचिका पर हस्तक्षेप से इनकार करते हुए बेंच ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती।

क्यों अहम है फैसला

यह मामला वाहन कंपनियों द्वारा किए जाने वाले विज्ञापन और तकनीकी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। साथ ही उपभोक्ताओं को यह संदेश भी देती है कि ऐसे मामलों में सही मंच उपभोक्ता आयोग  ही है।

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