भुगतान के विवाद को लेकर जयपुर की कंपनी की याचिका पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने Bhopal Municipal Corporation से जुड़े निर्माण ठेका के भुगतान विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। जस्टिस विवेक जैन की अदालत ने कहा- 'ऐसे मामलों में Central Arbitration and Conciliation Act, 1996 लागू नहीं हो सकता। नगर निगम राज्य सरकार के नियंत्रण में कार्य करने वाली सार्वजनिक संस्था है और म.प्र. मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत गठित ट्रिब्यूनल ही ऐसे विवादों का निपटारा करेगा। जयपुर की एक कंपनी चाह रही थी कि केंद्र सरकार के 1996 के कानून से उसके भुगतान विवाद का निराकरण किया जाए। हाईकोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि नगर निगम से जुड़े निर्माण ठेकों के विवादों में सिर्फ राज्य का विशेष अधिनियम ही लागू होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में नगर निगमों से जुड़े ठेका विवादों के लिए नजीर (precedent) साबित होगा। कोर्ट ने जयपुर की एक कंपनी की ओर से दायर 2 आर्बिट्रेशन याचिकाएं खारिज कर दी हैं।
ओवरहेड टैंक निर्माण के भुगतान का था विवाद
याचिकाकर्ता मे. मैव्रिक डेवलपर एण्ड कालोनाइजर्स प्रा.लि. जयपुर ने JNNURM प्रोजेक्ट के तहत Bhopal
Municipal Corporation द्वारा जारी की गई परियोजना के तहत भोपाल में कई स्थानों पर आरसीसी ओवरहेड टैंक और जल आपूर्ति वितरण
नेटवर्क का निर्माण कार्य किया था। इस निर्माण कार्य के भुगतान
से जुड़े विवाद
में आर्बिट्रेटर नियुक्त करने के लिए धारा 11(6) के तहत याचिका
दायर की थी।
अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न
- क्या 1996 का केंद्रीय कानून लागू होगा?
- या फिर म.प्र. मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983 के तहत ही मध्यस्थता होगी, जिसके लिए राज्य सरकार ने अलग से म.प्र. आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल गठित कर रखा है?
हाईकोर्ट की अहम
टिप्पणियां
अदालत ने कहा कि नगर पालिकाएं संविधान के भाग IX-A के तहत स्वशासी संस्थाएं हैं, लेकिन वे राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर नहीं हैं। नगर निगम को राज्य सरकार द्वारा वित्तीय और प्रशासनिक
रूप से नियंत्रित किया जाता है। यदि
नगर निगमों को राज्य से स्वतंत्र माना जाए, तो वे “अर्ध-राज्य (Quasi-State)” बन जाएंगी, जिसकी संविधान में कोई कल्पना नहीं है।
नगर निगम ‘पब्लिक अंडरटेकिंग’
हाईकोर्ट ने
स्पष्ट किया कि भोपाल नगर निगम अधिनियम, 1983 की धारा 2(g) के तहत “Public Undertaking” है। इस कारण ऐसे वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट विवादों पर 1996 का अधिनियम लागू
नहीं होगा। अदालत ने इस
संबंध में Supreme Court of India के पूर्व निर्णय L.G. Chaudhary Engineers-II पर भरोसा किया।
आर्बिट्रेटर नियुक्ति की याचिका खारिज
कोर्ट ने कंपनी की दोनों याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि वह धारा 11(6) के तहत आर्बिट्रेटर नियुक्त नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता म.प्र. मध्यस्थम् अधिकरण अधिनियम, 1983 के अंतर्गत गठित ट्रिब्यूनल में जा सकता है। यह छूट सीमावधि (Limitation Law) के अधीन होगी।
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