आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियुक्ति विवाद पर मप्र हाईकोर्ट का फैसला, याचिका खारिज,
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति से जुड़े एक अहम मामले में याचिकाकर्ता को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस विशाल धगट की अदालत ने स्पष्ट किया कि कट-ऑफ डेट के बाद प्राप्त की गई शैक्षणिक योग्यता के आधार पर अतिरिक्त अंक नहीं दिए जा सकते। यह फैसला आंगनवाड़ी और अन्य शासकीय नियुक्तियों में कट-ऑफ डेट और दस्तावेजों की समय-सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
क्या है पूरा मामला
मामला जिला सिवनी के तहसील लखनादौन अंतर्गत ग्राम घोघरा नगन, खमरिया का है, जहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के पद के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। याचिकाकर्ता स्वरूपा उइके को 14 दिसंबर 2022 को नियुक्ति दी गई थी, लेकिन बाद में यह नियुक्ति 13 मार्च 2023 को यह कहते हुए रद्द कर दी गई कि उसे ग्रेजुएशन के 10 अंक गलत तरीके से दे दिए गए थे।
अंकों में संशोधन के बाद मेरिट सूची में देववती पन्द्रे प्रथम स्थान पर आ गई और उसे नियुक्ति दे दी गई। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता स्वरूपा उइके ने कलेक्टर सिवनी के समक्ष अपील की, जहां से 06 फरवरी 2024 को कलेक्टर ने नियुक्ति निरस्तीकरण आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता स्वरूपा उइके की नियुक्ति बहाल कर दी।
कमिश्नर का फैसला बना निर्णायक
इसके बाद देववती पन्द्रे ने कमिश्नर, जबलपुर संभाग के समक्ष दूसरी अपील दायर की। कमिश्नर ने 02 अगस्त 2024 के आदेश में पाया कि याचिकाकर्ता स्वरूपा उइके ने आवेदन की अंतिम तिथि 21 अप्रैल 2022 से पहले ग्रेजुएशन पूर्ण नहीं किया था। बी.ए. फाइनल ईयर की मार्कशीट 15 सितम्बर 2022 की थी, जो कट-ऑफ डेट के बाद की है। आवेदन के समय केवल प्रथम और द्वितीय वर्ष की मार्कशीट प्रस्तुत की गई थी। इन तथ्यों के आधार पर कमिश्नर ने कलेक्टर का आदेश निरस्त कर दिया। कमिश्नर के इसी फैसले के खिलाफ स्वरूपा उइके ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने माना कमिश्नर का आदेश वैध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शाश्कीय अधिवक्ता कनक गहरवार और देववती पन्द्रे की ओर से अधिवक्ता अभिनव कुमार तिवारी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि यह तथ्यात्मक निष्कर्ष (finding of fact) है कि ग्रेजुएशन कट-ऑफ डेट के बाद पूरा हुआ। ऐसे तथ्यात्मक मामलों में रिट क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। शासन निर्देशों में यह नहीं लिखा कि यदि प्रोविजनल मेरिट लिस्ट पर आपत्ति नहीं की गई तो अपील नहीं हो सकती। कोर्ट ने माना कि कमिश्नर का आदेश पूरी तरह वैध है और याचिका पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इस मत के साथ अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
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