इंदौर बेंच से फार्मा कंपनियों को बड़ी राहत, एमआर की अपील खारिज
इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इन्दौर खण्डपीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव अथवा सेल्स प्रमोशन आॅफिसर को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत वर्कमैन नहीं माना जा सकता। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने इस मुद्दे को लेकर एक एमआर द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। मप्र हाईकोर्ट के इस फैसले से फार्मा कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी।देवास में रहने वाले अपीलकर्ता ज्योति कुमार शर्मा, में. जायडस हेल्थकेयर लिमिटेड कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में3 मार्च 1997 से कार्यरत था। वर्ष 2020 में उसे निलंबित कर विभागीय जांच के बाद सेवाओं से 30 जून 2021 को बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद कर्मचारी ने लेबर कोर्ट में औद्योगिक विवाद उठाते हुए खुद को वर्कमैन बताते हुए पुन: नियुक्ति और बैक वेजेस की मांग की।
लेबर कोर्ट की कार्रवाई पर सवाल-
फार्मा कंपनी ने लेबर कोर्ट में चल रही कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि ज्योति कुमार द्वारा मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में सेल्स प्रमोशन का कार्य किया जाता रहा। उसका काम तकनीकी और स्किल्ड है वह वर्कमैन की परिभाषा में नहीं आता। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 27 अगस्त 2024 को सरकारी रेफरेंस को ही अवैध करार दिया।सिंगल बेंच के इस फैसले के खिलाफ यह अपील दाखिल की गई थी।
डिवीजन बेंच की दो टूक-
डिवीजन बेंच ने कहा कि डॉक्टरों से संपर्क करना, दवाओं का प्रचार करना और आॅर्डर बुक करना मैन्युअल या क्लेरिकल कार्य नहीं है। मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव वर्कमैन नहीं हैं। अपने फैसले में डिवीजन बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर फैसला दे चुका है। यह कानून अब पूरी तरह सेटल्ड लॉ बन चुका है।
फैसले का क्या होगा असर-
इस फैसले से फार्मा कंपनियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अब मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव लेबर कोर्ट के दायरे से बाहर होंगे और कंपनियों की एचआर पॉलिसी को मजबूती मिलेगी। साथ ही एमआर के केस सीधे लेबर कोर्ट में दाखिल नहीं हो सकेंगे।
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