आशा सहयोगी नियुक्ति मामले पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 12 साल की नौकरी के बाद भी राहत नहीं, अपील खारिज
ग्वालियर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने आशा सहायोगी की नियुक्ति से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए अपील खारिज कर दी। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस डीडी बंसल की डिवीज़न बेंच ने स्पष्ट किया कि अधिक मेरिट वाले अभ्यर्थी के अधिकार को केवल लंबे समय से की जा रही नौकरी के आधार पर नकारा नहीं जा सकता। यह अपील वर्ष 2014 के एक नियुक्ति से सम्बंधित मामले में 19 सितम्बर 2025 को सिंगल बेंच द्वारा पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें अनीता कुशवाहा के पक्ष में फैसला दिया गया था। यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि सरकारी नियुक्तियों में मेरिट सर्वोपरि है, चाहे कोई व्यक्ति वर्षों से पद पर क्यों न कार्यरत हो।
क्या था पूरा विवाद
मामला ग्वालियर जिले के बेहट सेक्टर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) हस्तिनापुर से जुड़ा है, जहां आशा सहायोगी के पद पर प्रेमा देवी की नियुक्ति 6 मार्च 2014 को की गई थी। इस नियुक्ति के खिलाफ अनीता कुशवाहा ने 07 अप्रैल 2014 को आपत्ति दर्ज कराई और बाद में रिट याचिका दायर की।
सिंगल बेंच का आदेश
सिंगल बेंच ने 19 सितम्बर 2025 के अपने आदेश में माना कि अनीता कुशवाहा ने महार्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान, भोपाल से उत्तर मध्यमा (हायर सेकेंडरी) संस्कृत परीक्षा उत्तीर्ण की है। शासन के 27 अप्रैल 2009 के सर्कुलर के अनुसार यह योग्यता एमपी बोर्ड की 10+2 परीक्षा के समकक्ष है। अनीता कुशवाहा ने 58% अंक, जबकि प्रेमा देवी ने 43% अंक प्राप्त किए। सिंगल बेंच ने अधिक मेरिट के आधार पर प्रेमा देवी की नियुक्ति रद्द करके अनीता कुशवाहा को नियुक्त करने के निर्देश दिए थे।
डिवीजन बेंच की अहम टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने कहा कि उत्तर मध्यमा प्रमाणपत्र को 10+2 के समकक्ष मानना पूरी तरह वैध है। प्रेमा देवी मेरिट में पीछे है, इसलिए केवल 12 साल की सेवा के आधार पर उसे कोई भी संरक्षण नहीं दिया जा सकता। डिवीज़न बेंच ने सिंगल बेंच के आदेश को विधि सम्मत पाते हुए प्रेमा देवी की ओर से दाखिल अपील प्रारंभिक सुनवाई के स्तर पर ही खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान अनीता कुशवाहा की ओर से अधिवक्ता उदित सक्सेना और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मोदी ने पक्ष रखा।
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