सिंगरौली कलेक्टर के आदेश को पलटकर हाईकोर्ट ने दिया 45 दिन का समय
जबलपुर | राष्ट्रीय राजमार्ग NH-75 फोरलेन परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि के मुआवजे को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विशाल मिश्रा की अदालत ने सिंगरौली कलेक्टर/अर्बिट्रेटर द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 26 के तहत विशेषज्ञ राय लेने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अधिग्रहण को 10 वर्ष बीत जाने के आधार पर विशेषज्ञ राय से इनकार नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब मुआवजा निर्धारण में गंभीर विवाद और दस्तावेजी विरोधाभास मौजूद हों। कोर्ट ने 04.04.2025 का आदेश निरस्त करते हुए मामला कलेक्टर-सह-अर्बिट्रेटर को वापस भेज दिया है और निर्देश दिए हैं कि 45 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर देकर Section 26 के आवेदन पर नया, कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए।
केवल ₹77,176 मुआवजा तय, ₹13 लाख का दावा
याचिकाकर्ता आदित्य प्रसाद की भूमि ग्राम जियावन, खसरा नंबर 374/2 (0.040 हेक्टेयर) को NH-75 (Four Lane Highway) निर्माण के लिए अधिग्रहित किया गया था। भूमि अधिग्रहण अधिकारी द्वारा मात्र ₹77,176 का मुआवजा तय किया गया, जबकि याचिकाकर्ता ने भूमि को डाइवर्टेड, बहुफसली बताते हुए ₹450 प्रति वर्गफुट की दर से मूल्यांकन और करीब ₹13 लाख मुआवजे की मांग की थी।
सरकारी रिपोर्ट में भी गाइडलाइन 2012-13 का हवाला
याचिकाकर्ता की और से पैरवी करते हुए अधिवक्ता जय शुक्ला ने अदालत को बताया कि SDO-cum-Land Acquisition Officer की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि मुआवजा गाइडलाइन 2012-13 और उसके क्लॉज 4.4 के अनुसार तय किया जाना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद विशेषज्ञ राय नहीं ली गई।
केरल हाईकोर्ट के फैसलों का सहारा
हाईकोर्ट ने Unnikrishnan बनाम Arbitrator (2023) और Punarnava Ayurveda Hospital बनाम Arbitrator (2024) मामलों का हवाला देते हुए कहा कि अर्बिट्रेशन कार्यवाही में पक्षकार को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए, क्योंकि बाद में Section 34 के तहत हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित होती है।
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