जबलपुर | मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान उस वक्त असहज स्थिति पैदा हो गई, जब एक वकील ने अदालत की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठा दिए। जूनियर और सीनियर वकील के भेदभाव का तर्क देना एडवोकेट सुदीप सिंह सैनी को इतना भारी पड़ा कि उन्हें कोर्ट से 'बिना शर्त माफी' मांगनी पड़ी। जस्टिस राम कुमार चौबे ने मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए वकील को भविष्य में सचेत रहने की चेतावनी दी है।
क्या था पूरा मामला?
बीते 6 मई को आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) के तहत मंडला जिले के बीजाडांडी थाने में जगदीश वरकड़े के खिलाफ मामला दर्ज है। उस पर आरोप है कि गरीबों के लिए भेजा गया राशन उसने जून से अगस्त 2025 कस बीच नहीं बांटा। इस मामले में जमानत का लाभ पाने यह अर्जी हाईकोर्ट में दाखिल की गई। जमानत पर बहस करते हुए एडवोकेट सुदीप सिंह सैनी ने टिप्पणी की थी कि— "इसी तरह के मामलों में सीनियर वकीलों के खड़े होने पर कोर्ट जमानत दे देता है, लेकिन जूनियर वकील होने के कारण उनके मुवक्किल को राहत नहीं मिल रही।"
इस बयान पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए इसे 'न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ' और 'अपमानजनक' माना। 6 मई को हुई सुनवाई पर कोर्ट ने वकील को चुनौती दी कि वे उन आदेशों की प्रतियां पेश करें, जिनके आधार पर वे यह भेदभाव का आरोप लगा रहे हैं।
दावे निकले खोखले, कोर्ट ने दिखाई सख्ती
मामले पर आगे हुई सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने सबूत मांगे, तो वकील सैनी के तेवर ढीले पड़ गए। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास ऐसा कोई आदेश नहीं है जिसमें सिर्फ 'सीनियर वकील' होने के नाते जमानत दी गई हो। जब कोर्ट ने पूछा कि बिना किसी आधार के इतना बड़ा बयान कैसे दिया, तो वकील ने सफाई देने की कोशिश की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।
अवमानना की कार्रवाई से बचे वकील
अदालत ने वकील की इस हरकत को 'कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट' (अदालत की अवमानना) की श्रेणी में माना और पूछा कि क्यों न उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू की जाए? स्थिति बिगड़ती देख एडवोकेट सैनी ने फौरन कोर्ट से बिना शर्त माफी मांग ली।
कोर्ट की दो टूक: "मर्यादा में रहें"
कोर्ट ने वकील की माफी स्वीकार करते हुए अवमानना की कार्यवाही तो रोक दी, लेकिन उन्हें कड़ी चेतावनी जारी की है। कोर्ट ने आदेश में स्पष्ट कहा-
"वकील न्यायिक कार्यवाही की पवित्रता को समझें और अदालत के समक्ष दलीलें पेश करते समय अपनी मर्यादा और शब्दों का चयन सोच-समझकर करें।"
हाईकोर्ट का आदेश देखें MCRC-14288-2026
