DG (Prisons) को जांच के आदेश, 4 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करना कहा
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में रीवा सेंट्रल जेल से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें फर्जी वकालतनामा और जेल प्रशासन की कथित मिलीभगत का गंभीर संदेह जताया गया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जेल के भीतर एक संगठित “रैकेट” यानी “जेल माफिया” सक्रिय हो सकता है, जो न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिचौलियों को जेल अधिकारियों की मिलीभगत से न्याय के उद्देश्यों को विफल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मामले की गंभीरता को देखते हुए बेंच ने मप्र के Director General of Prisons को जांच के आदेश देते हुए 4 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं।
6 आरोपियों ने दाखिल की है अपील
मामला सिंगरौली जिले के बरगवां थाना क्षेत्र में हुई हत्या से जुड़ा है, जिसमें 6 आरोपियों को 11 अगस्त 2023 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इस सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई है। सुनवाई के दौरान आरोपी अरविन्द कुमार यादव, बृजेन्द्र कुमार यादव और रामबरन यादव की ओर से वकील बदलने के लिए आवेदन पेश किया गया।
वकालतनामा पर उठे सवाल
अधिवक्ता सिद्धार्थ दत्त ने कोर्ट को बताया कि
- आवेदन केवल 3 आरोपियों की ओर से था।
- वकालतनामा में सभी 6 आरोपियों के हस्ताक्षर दर्शाए गए।
- वकालतनामा में जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट के हस्ताक्षर भी थे।
- लेकिन वकालतनामा पर तारीख दर्ज नहीं थी।
सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि तीन आरोपी साहब लाल यादव, रामप्रसाद यादव और ललता प्रसाद पहले ही जमानत पर बाहर थे, फिर उनके नाम से जेल से वकालतनामा कैसे जारी हुआ?
“यह संगठित रैकेट की ओर इशारा है” हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने कहा कि यह पूरा मामला एक संगठित रैकेट की ओर इशारा करता है, जिसमें बिचौलिए, कुछ वकील और जेल अधिकारी मिलकर काम कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया “बिना किसी पारिवारिक निर्देश या वैध प्रक्रिया के कोई वकील सीधे जेल प्रशासन से वकालतनामा कैसे प्राप्त कर सकता है?”
डीजी को जांच के निर्देश
कोर्ट ने महानिदेशक (जेल) को निर्देश दिए हैं कि वे 4 सप्ताह में विस्तृत जांच करके अपनी रिपोर्ट पेश करें और पूरे मामले की सच्चाई सामने लाएं।
