LAW'S VERDICT

तिरंगे के अपमान: मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को नोटिस, MPMLA कोर्ट ने पूछा– क्यों न FIR दर्ज की जाए?

गाडरवारा की तिरंगा यात्रा में राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा भंग करने का है आरोप


जबलपुर। मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह तिरंगे के कथित अपमान से जुड़े एक मामले में कानूनी घेराबंदी में आ गए हैं। MP-MLA की विशेष न्यायालय के न्यायाधीश डी.पी. सूत्रकार ने मामले में मंत्री को नोटिस जारी किया है। अदालत ने मंत्री से स्पष्टीकरण मांगा है कि क्यों न उनके विरुद्ध राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के आरोप में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का आदेश दिया जाए?
यह मामला नरसिंहपुर जिले के गोटेगांव निवासी कोशल द्वारा दायर परिवाद पर आधारित है। परिवादी ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2024 में आयोजित एक तिरंगा यात्रा के दौरान राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा का उल्लंघन किया गया।

तिरंगा यात्रा के दौरान हुआ कथित अपमान

परिवाद के अनुसार 11 अगस्त 2024 को नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में तिरंगा यात्रा निकाली गई थी, जिसका नेतृत्व मंत्री राव उदय प्रताप सिंह कर रहे थे। आरोप है कि इस दौरान मंत्री एक खुली जीप के बोनट पर बैठकर लोगों को संबोधित कर रहे थे।
परिवादी का कहना है कि जीप के बोनट पर राष्ट्रीय ध्वज को इस तरह से फैला दिया गया था कि वह झुक रहा था और मंत्री के पैरों को स्पर्श कर रहा था। इससे राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा प्रभावित हुई, जो कानून के विरुद्ध है।

राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम का उल्लंघन

परिवादी ने अपने परिवाद में कहा है कि यह कृत्य राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 के स्पष्टीकरण 4(ज) का उल्लंघन है। इस प्रावधान के अनुसार किसी वाहन के बोनट, छत या अन्य हिस्से को राष्ट्रीय ध्वज से ढंकना या उसे इस प्रकार रखना जिससे उसकी गरिमा प्रभावित हो, प्रतिबंधित है।
यह एक संज्ञेय अपराध है, जिसमें दोष सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक का कारावास या जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान है।

मंत्री के खिलाफ पुलिस ने दर्ज नहीं की FIR

परिवादी का कहना है कि घटना के बाद सबसे पहले थाना गाडरवारा में शिकायत दी गई, लेकिन पुलिस ने मंत्री के पद का हवाला देते हुए मामला दर्ज नहीं किया। इसके बाद पुलिस अधीक्षक नरसिंहपुर को भी कई बार लिखित शिकायतें भेजी गईं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
परिवादी के अनुसार जब शिकायत पंजीकृत डाक से थाना प्रभारी गाडरवारा को भेजी गई, तब भी उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया, जो पुलिस के वैधानिक कर्तव्यों के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

परिवादी ने अपने परिवाद में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014)’ का हवाला दिया है। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलती है तो पुलिस के लिए FIR दर्ज करना अनिवार्य है।

साक्ष्यों पर विचार के बाद कोर्ट ने जारी किया नोटिस

विशेष न्यायालय ने परिवादी के बयान और प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार किया। परिवादी की ओर से घटना से संबंधित तस्वीरें, मीडिया क्लिपिंग, डाक अस्वीकार की ट्रैकिंग रिपोर्ट तथा विभिन्न अधिकारियों को भेजी गई शिकायतों की प्रतियां अदालत के समक्ष पेश की गईं। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने मंत्री राव उदय प्रताप सिंह को नोटिस जारी कर जवाब प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। परिवादी की ओर से असीम त्रिवेदी, प्रशांत अवस्थी, प्रशांत सिरमोलिया, विनीत टेहेनगुनिया, शुभम पाटकर, पंकज तिवारी और आनंद शुक्ला अधिवक्ता पैरवी कर रहे हैं।

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