LAW'S VERDICT

BREAKING NEWS....ओबीसी आरक्षण की सुनवाई का रास्ता साफ़, 2 अप्रैल को होगी पहली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को ट्रांसफर किये हैं 10 मामले 

जबलपुर। राज्य की पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसदी करने से उपजे विवाद को लेकर दाखिल हुई याचिकाओं की सुनवाई का रास्ता साफ़ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रांसफर किये गए मामलों पर मप्र हाईकोर्ट ने सुनवाई के लिए नई व्यवस्था दी है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि ये सभी मामले 2 अप्रैल को सूचीबद्ध होंगे। उस दिन सभी पक्ष हाजिर होकर अपने-अपने मुकदमों की सूची पेश करें, ताकि सभी मामले सुनवाई के लिए लिस्ट किये जा सकें। सभी पक्षों की जानकारी आने के बाद 16 अप्रैल से इन मामलों पर अंतिम सुनवाई (final hearing) की जायेगी। 

वर्ष 2019 में बने कानून से उपजा विवाद 

गौरतलब है कि अशिता दुबे व 11 अन्य की ओर से दायर इन मामलों में प्रदेश की पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण बढ़ाकर 27 प्रतिशत किये जाने को चुनौती दी गई है। प्रदेश सरकार ने 8 जुलाई 2019 को ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण 27 प्रतिशत किये जाने के संबंध में विधानसभा से बिल पारित करके उसका गजट नोटिफिकेशन 17 जुलाई 2019 को प्रकाशित किया था। आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाए जाने को इन मामलों में असंवैधानिक और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के खिलाफ बताया गया है।  

सुप्रीम कोर्ट ने वापस भेजे मामले 

हाईकोर्ट द्वारा की जा रही सुनवाई के खिलाफ ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास बुला लिया था। सुप्रीम कोर्ट के 20 अगस्त 2024 के आदेश पर मप्र हाईकोर्ट ने 2 सितम्बर 2024 को ये  सभी 10 मामले ट्रांसफर कर दिए थे। इसके बाद 19 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को वापस मप्र हाईकोर्ट को ट्रांसफर कर दिया था। 

लीड केस को लेकर विवाद 

सोमवार को इन मामलों पर हुई सुनवाई के दौरान लीड केस को लेकर विवाद हुआ। याचिकाकर्ता अशिता दुबे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायलय ने उनके केस को लीड केस माना है। वहीं याचिकाकर्ता शिवम् गौतम की ओर से अधिवक्ता वरुण ठाकुर ने कहा कि उनका केस, लीड केस है। इस पर बेंच ने कहा कि हम सभी केसों को एकसाथ लिस्ट कऱ सभी की सुनवाई एकसाथ होगी। वैसे भी अशिता दुबे का केस वर्ष 2019 का है, जबकि शिवम गौतम का केस वर्ष 2022 का है। 

3 में से एक माह का वक़्त बीत गया  

वरिष्ठ अधिवक्ता श्री संघी ने कहा कि वर्ष 2019 से ये मामले चल रहे हैं। हाईकोर्ट द्वारा दिए गए अंतरिम आदेश (stay) के कारण बड़ी संख्या में प्रमोशन अटके हुए हैं। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट ने 3 माह में मामलों का निराकरण करने कहा था, जिसमे थे 1 माह बीत चुका है। इस पर बेंच ने कहा कि हम सभी पहलुओं से भली भाति परिचित हैं, इसीलिए सुनवाई की पूरी वयवस्था बनाई है, ताकि फाइनल हियरिंग करके 3 माह में मामलों पर फैसला दिया जा सके।

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