LAW'S VERDICT

झूठे हलफनामे पर आर्म्स लाइसेंस रिन्यू कराने वाले की हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत अर्जी ठुकराई



कोर्ट ने कहा- “गंभीर तथ्यों को छिपाकर हथियार लाइसेंस लेना बर्दाश्त नहीं”  

जबलपुर। झूठी घोषणा के आधार पर हथियार लाइसेंस का नवीनीकरण कराने के आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की कोर्ट ने कहा कि यदि लाइसेंस गलत तथ्यों को छिपाकर लिया गया है, तो ऐसे व्यक्ति को राहत नहीं दी जा सकती। मामला भोपाल के हनुमानगंज थाना क्षेत्र का है, जहां आरोपी फैज़ान खान के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 318(4), 216, 237 तथा आर्म्स एक्ट की धारा 30 के तहत प्रकरण दर्ज किया गया।

पहले दर्ज मामले को छिपाने का है आरोप?

आरोप है कि आरोपी फैज़ान खान ने एक हलफनामे में यह घोषित किया कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला न तो दर्ज है और न ही लंबित। इसी घोषणा के आधार पर उसका आर्म्स लाइसेंस रिन्यू कर दिया गया। लेकिन रिकॉर्ड से सामने आया कि वर्ष 2019 में उसके खिलाफ हनुमानगंज थाने में IPC की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज हुआ था और वह ट्रायल का सामना भी कर चुका था। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि 7 मार्च 2019 को आरोपी को बरी कर दिया गया था क्योंकि गवाह मुकर गए थे। साथ ही यह भी कहा गया कि विवादित घोषणा हलफनामे का हिस्सा नहीं, बल्कि उसके पीछे की ओर हस्तलिखित टिप्पणी थी। हालांकि, यह स्वीकार किया गया कि उस टिप्पणी पर आरोपी के हस्ताक्षर मौजूद हैं।

सिर्फ बरी होना काफी नहीं 

कोर्ट ने कहा- आरोपी द्वारा शपथपत्र में की गई घोषणा स्पष्ट थी कि उस पर न कोई मामला दर्ज नहीं और न ही लंबित है। वास्तविकता यह थी कि मामला दर्ज हुआ था और ट्रायल भी चला था। गवाहों के hostile (पक्षविरोधी) होने के कारण बरी हो गया। ऐसे में आरोपी यह नहीं कह सकता कि उसके खिलाफ कभी कोई मामला दर्ज ही नहीं हुआ। कोर्ट ने पाया कि झूठी घोषणा के आधार पर लाइसेंस रिन्यू कराया गया, इसलिए अग्रिम जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपी ने गलत तथ्य प्रस्तुत कर लाइसेंस प्राप्त किया है। अतः धारा 482 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता / 438 CrPC के तहत अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट का आदेश देखें  MCRC-6817-2026

Post a Comment

Previous Post Next Post