40 साल से काम कर रहे चपरासी को मिली हाईकोर्ट से बड़ी राहत, 90 दिनों में उसका हक देने के आदेश
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में करीब 40 वर्षों से सेवा दे रहे अंशकालिक चपरासी को बड़ी राहत दी है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने सिंगल बेंच द्वारा याचिका खारिज करने के आदेश को निरस्त करते हुए कर्मचारी को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप उसका हक़ 90 दिनों के भीतर देने के आदेश दिए हैं। हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों कर्मचारियों के लिए उम्मीद की किरण है जो वर्षों से अंशकालिक या अस्थायी पदों पर नियमित कर्मचारियों की तरह काम तो कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें उनका हक नहीं मिला।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता गोविन्द दस नापित को शिक्षा विभाग द्वारा निवाड़ी जिले के नवस्थापित शासकीय माध्यमिक विद्यालय उबौरा में चपरासी के पद पर वर्ष 1997 को नियुक्त किया गया था। नियुक्ति सक्षम अधिकारी की अनुमति से हुई और वह वर्ष 1997 से अभी तक लगातार स्कूल के पूरे समय में कार्य करता रहा।
सिंगल बेंच ने क्यों खारिज की थी याचिका?
याचिकाकर्ता ने नियमितीकरण की मांग की थी, जिसे सिंगल बेंच ने 8 नवंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट के कुछ पुराने फैसलों का हवाला देते हुए बिना नोटिस जारी किए ही खारिज कर दिया था। कोर्ट का मत था कि नियुक्ति अवैध है और नियमितीकरण संभव नहीं।
जब पूरा समय काम, तो अंशकालिक कैसे?
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सभी 14 पद स्वीकृत (Sanctioned) थे और याचिकाकर्ता गोविन्द दस नापित की नियुक्ति चयन प्रक्रिया के बाद हुई थी। कर्मचारी ने निरंतर, बिना ब्रेक पूरे स्कूल समय में कार्य किया। चुनाव जैसे सरकारी कार्यों में भी ड्यूटी लगाई गई। ऐसे में कर्मचारी को केवल “पार्ट टाइम” कहना अनुचित और अव्यावहारिक है। डिवीज़न बेंच ने याचिकाकर्ता को 90 दिनों के भीतर उसका हक़ देने के आदेश दिए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विशाल पटेरिया ने पक्ष रखा।
