LAW'S VERDICT

OBC क्रीमी लेयर पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ सैलरी के आधार पर जाति प्रमाण पत्र से नहीं किया जा सकता इनकार

पिता के वेतन को ही बना लिया था क्रीमी लेयर का आधार, ग्वालियर बेंच ने राजस्व अधिकारियों के आदेश किए निरस्त; छह सप्ताह में नए सिरे से निर्णय लेने के निर्देश

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, ग्वालियर।

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल अधिक वेतन होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में शामिल मानकर उसका जाति प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके लिए संबंधित व्यक्ति की सेवा श्रेणी, नियुक्ति के समय पद, पदोन्नति की आयु और लागू सरकारी दिशा-निर्देशों पर समग्रता से विचार करना आवश्यक है।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की एकलपीठ ने राजस्व अधिकारियों द्वारा पारित दो आदेशों को निरस्त करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया है। अदालत ने छह सप्ताह के भीतर सभी प्रासंगिक तथ्यों और नियमों के आधार पर नया, तर्कसंगत आदेश पारित करने के निर्देश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

नर्मदापुरम के ऑफिसर्स कॉलोनी में रहने वाली सुश्री रागिनी राठौर ने अशोकनगर के अपर कलेक्टर द्वारा 29 नवंबर 2022 को पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस आदेश में उनकी अपील खारिज करते हुए एसडीओ (राजस्व), इसागढ़ के 23 अक्टूबर 2020 के आदेश को बरकरार रखा गया था। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी व अधिवक्ता वेदिका और प्रतिभा की दलील थी कि प्रशासनिक अधिकारियों ने याचिकाकर्ता के पिता के पिछले तीन वर्षों के सकल वेतन 16,99,282 रुपये को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर के दायरे में मान लिया था। इसी आधार पर याचिकाकर्ता को ओबीसी जाति प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि उनके पिता की नियुक्ति प्रारंभ में सिविल जज क्लास-II के पद पर हुई थी और 40 वर्ष की आयु के बाद उन्हें सिविल जज क्लास-I के पद पर पदोन्नति मिली थी। यह भी बताया गया कि उनके पिता की आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है।

केवल वेतन से तय नहीं होगी क्रीमी लेयर की स्थिति

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित अधिकारियों ने पिता के वेतन के आंकड़ों को ही निर्णय का मुख्य आधार बना लिया, जबकि उनकी नियुक्ति के समय की सेवा स्थिति और पदोन्नति की तिथि जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों की जांच नहीं की गई। अदालत ने स्पष्ट किया कि ओबीसी क्रीमी लेयर के निर्धारण में केवल वेतन या आय को आय एवं संपत्ति परीक्षण का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता। इसके लिए सेवा श्रेणी से संबंधित नियमों और सरकारी दिशा-निर्देशों का समग्र परीक्षण जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Union of India v. Rohith Nathan सहित अन्य प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया। अदालत ने इन निर्णयों के आलोक में कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय संबंधित सेवा श्रेणी और लागू नियमों को ध्यान में रखना आवश्यक है। केवल वेतन की राशि के आधार पर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने दिए ये निर्देश

याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए-

  1. दोनों आदेश निरस्त: एसडीओ (राजस्व), इसागढ़ द्वारा 23 अक्टूबर 2020 और अपर कलेक्टर, अशोकनगर द्वारा 29 नवंबर 2022 को पारित आदेश रद्द किए गए।

  2. मामला पुनर्विचार के लिए वापस: प्रकरण सक्षम प्राधिकारी को नए सिरे से निर्णय लेने के लिए भेजा गया।

  3. छह सप्ताह की समय-सीमा: प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों, सरकारी सर्कुलर, पिता की पदोन्नति की तिथि और अन्य संबंधित रिकॉर्ड पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया जाए।

  4. तर्कसंगत आदेश: सभी तथ्यों और नियमों का परीक्षण करने के बाद छह सप्ताह के भीतर नया आदेश पारित किया जाए।

अंतिम निर्णय का अधिकार सक्षम प्राधिकारी के पास

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है। सक्षम प्राधिकारी सभी प्रासंगिक तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के लिए अधिकृत होंगे। इस फैसले से यह कानूनी सिद्धांत स्पष्ट हुआ है कि ओबीसी क्रीमी लेयर के निर्धारण में केवल वेतन को आधार बनाकर जाति प्रमाण पत्र के आवेदन को खारिज नहीं किया जा सकता; संबंधित सेवा श्रेणी और नियमों का परीक्षण भी आवश्यक है।


हाईकोर्ट का आदेश देखें      WP-14027-2023

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