नोटिस नहीं मिलने पर अवॉर्ड की जानकारी की तारीख से शुरू होगी लिमिटेशन; रेफरेंस कोर्ट मेरिट पर फैसला किए बिना याचिका खारिज नहीं कर सकती
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण और मुआवजे से जुड़े मामलों में जमीन मालिकों के हित में महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। जस्टिस विनय सराफ की सिंगल बेंच ने 38 मामलों पर सोमवार को फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि जमीन मालिक या उसका प्रतिनिधि अवॉर्ड पारित होने के समय मौजूद नहीं था और कलेक्टर ने अवॉर्ड की सूचना या नोटिस भी विधि के अनुसार नहीं दिया, तो रेफरेंस दाखिल करने की समय-सीमा अवॉर्ड की जानकारी मिलने की तारीख से शुरू होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कलेक्टर द्वारा भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत रेफरेंस कोर्ट को भेजे गए मामले को रेफरेंस कोर्ट प्रारंभिक स्तर पर केवल लिमिटेशन के आधार पर खारिज नहीं कर सकती। उसे मामले का मेरिट पर फैसला करना होगा।
इंदौर-दाहोद रेलवे लाइन के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला
मामला इंदौर-दाहोद रेलवे लाइन के लिए पश्चिम रेलवे की ओर से किए गए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। जमीन अधिग्रहण के लिए 10 जनवरी 2018 को अधिसूचना जारी की गई थी। इसके बाद 25 सितंबर 2018 को जमीन मालिकों को नोटिस जारी कर आपत्तियां आमंत्रित की गईं। आपत्तियों पर सुनवाई के बाद 4 जून 2020 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने अवॉर्ड पारित किया। इसके बाद जमीन मालिक ने 13 जून 2025 को रेफरेंस आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे कलेक्टर ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 64 के तहत रेफरेंस कोर्ट को भेज दिया।
1834 दिन की देरी बताकर रेफरेंस खारिज
रेफरेंस कोर्ट में प्रतिवादी नंबर-3 ने सीपीसी के Order VII Rule 11(d) और Section 151 के तहत आवेदन देकर रेफरेंस याचिका खारिज करने की मांग की। तर्क दिया गया कि मामला लिमिटेशन से बाहर है। रेफरेंस कोर्ट ने 30 जून 2026 को आवेदन स्वीकार करते हुए रेफरेंस याचिका को समय-सीमा से बाहर मानकर खारिज कर दिया। प्रतिवादी की ओर से हाईकोर्ट में यह तर्क दिया गया कि 4 जून 2020 को अवॉर्ड पारित हुआ था, जबकि रेफरेंस 13 जून 2025 को दाखिल किया गया। यानी इसमें 1834 दिनों की देरी हुई।
जमीन मालिक का दावा—अवॉर्ड की जानकारी ही नहीं दी गई
जमीन मालिक की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि अवॉर्ड पारित होने की सूचना उसे कभी नहीं दी गई। अवॉर्ड तैयार किए जाने के समय वह या उसका प्रतिनिधि/वकील भी मौजूद नहीं था। याचिकाकर्ता के अनुसार उसे वर्ष 2025 में मुआवजा राशि का भुगतान किए जाने के दौरान अवॉर्ड की जानकारी हुई। जानकारी मिलते ही उसने कलेक्टर के समक्ष रेफरेंस आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे कलेक्टर ने विधिवत रेफरेंस कोर्ट भेज दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से तय हुई कानूनी स्थिति
हाईकोर्ट ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के Parsottambhai Maganbhai Patel, Bhagwandas और Premji Nathu मामलों में प्रतिपादित कानून पर भरोसा किया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार, जब अवॉर्ड की विधिवत जानकारी नहीं दी गई हो तो रेफरेंस दाखिल करने की लिमिटेशन अवॉर्ड की जानकारी मिलने की तारीख से शुरू होगी।
धारा 64(2)(b) में ‘Section 21’ को Section 37(2) पढ़ा जाएगा
हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्याख्या करते हुए कहा कि 2013 के अधिनियम की धारा 64(2)(b) में इस्तेमाल किए गए “Section 21” शब्द को “Section 37(2)” के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि यदि जमीन मालिक या उसका प्रतिनिधि अवॉर्ड पारित होने के समय मौजूद नहीं था और कलेक्टर ने धारा 37(2) के अनुसार अवॉर्ड की सूचना या नोटिस नहीं दिया, तो लिमिटेशन अवॉर्ड की जानकारी मिलने की तारीख से शुरू होगी और जमीन मालिक जानकारी मिलने की तारीख से छह महीने के भीतर रेफरेंस दाखिल कर सकता है।
रेफरेंस कोर्ट मेरिट पर फैसला किए बिना नहीं कर सकती खारिज
हाईकोर्ट ने दूसरा महत्वपूर्ण सिद्धांत यह तय किया कि जब कलेक्टर किसी रेफरेंस को अधिनियम की धारा 64 के तहत रेफरेंस कोर्ट भेज देता है, तो कोर्ट का दायित्व है कि वह मामले का मेरिट पर फैसला करे। रेफरेंस कोर्ट किसी प्रारंभिक स्तर पर केवल Order VII Rule 11 के आधार पर रेफरेंस को खारिज नहीं कर सकती।
Section 115 CPC की सिविल रिवीजन भी होगी maintainable
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेफरेंस कोर्ट द्वारा Order VII Rule 11 के तहत रेफरेंस याचिका खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ CPC की धारा 115 के तहत सिविल रिवीजन याचिका सुनवाई योग्य है।
समय-सीमा के आधार पर खारिज आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने रेफरेंस कोर्ट द्वारा समय-सीमा के आधार पर खारिज किए गए सभी आदेशों को निरस्त कर दिया। संबंधित मामलों को वापस रेफरेंस कोर्ट भेजते हुए निर्देश दिया गया कि पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देकर मामलों का कानून के अनुसार मेरिट पर निर्णय किया जाए। इन सभी सिविल रिवीजन याचिकाओं को हाईकोर्ट ने उपरोक्त शर्तों के साथ स्वीकार कर लिया। मामले में लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट के फैसले के तीन बड़े निष्कर्ष
1. अवॉर्ड की जानकारी नहीं मिली तो: नोटिस न मिलने की स्थिति में लिमिटेशन अवॉर्ड की जानकारी मिलने की तारीख से शुरू होगी।
2. रेफरेंस कोर्ट का दायित्व: कलेक्टर द्वारा रेफर किए गए मामले को केवल प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता; मेरिट पर फैसला करना होगा।
3. सिविल रिवीजन का रास्ता खुला: Order VII Rule 11 के तहत रेफरेंस खारिज होने के खिलाफ Section 115 CPC की सिविल रिवीजन maintainable होगी।
