हाईकोर्ट का अहम फैसला: परमिट नहीं होने से तीसरे पक्ष के प्रति बीमा कंपनी की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, 6 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान का आदेश
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर |
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि दुर्घटना के समय वाहन के पास वैध परमिट नहीं होने के बावजूद बीमा कंपनी तीसरे पक्ष के पीड़ितों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। जस्टिस बीपी शर्मा की एकलपीठ ने कहा कि बीमा कंपनी पहले दावेदारों को मुआवजा राशि का भुगतान करेगी और इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत वाहन मालिक तथा चालक से यह रकम वसूल सकेगी। अदालत ने बीमा कंपनी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने बीमा कंपनी को 6 प्रतिशत ब्याज सहित मुआवजा अदा करने का निर्देश दिया है।
बस की टक्कर से युवक की मौत, बहनोई घायल
मामला 18 अप्रैल 2008 का है। दुर्घटना के दिन उमेश अपने बहनोई लक्ष्मी प्रसाद के साथ मोटरसाइकिल से जा रहा था। इसी दौरान विपरीत दिशा से आ रही एक बस ने उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। हादसा इतना गंभीर था कि उमेश की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि लक्ष्मी प्रसाद घायल हो गया। घटना के बाद थाना बीजाडांडी में मामला दर्ज किया गया और मृतक के परिजनों सहित अन्य प्रभावित पक्षों ने मुआवजे के लिए दावा पेश किया।
दावा अधिकरण ने बीमा कंपनी को भी ठहराया जिम्मेदार
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जबलपुर ने 22 दिसंबर 2010 को मामले में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी, बस मालिक और चालक को संयुक्त रूप से मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी ठहराया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। कंपनी का तर्क था कि दुर्घटना के समय बस के पास वैध परमिट नहीं था। यह मोटर व्हीकल एक्ट और बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है, इसलिए बीमा कंपनी को मुआवजा देने के दायित्व से मुक्त किया जाना चाहिए।
परमिट का उल्लंघन सही, लेकिन पीड़ितों को भुगतान से इनकार नहीं
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान माना कि दुर्घटना के समय बस बिना वैध परमिट के संचालित हो रही थी और बीमा कंपनी का इस संबंध में उठाया गया तर्क सही है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि परमिट की कमी के आधार पर तीसरे पक्ष के दावेदारों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी से बीमा कंपनी को पूरी तरह मुक्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने बीमा कंपनी को पहले दावेदारों को मुआवजा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके बाद कंपनी को वाहन मालिक और चालक से कानूनी प्रक्रिया के तहत राशि वसूलने की स्वतंत्रता दी गई।
पीड़ितों के हितों को प्राथमिकता
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वाहन के परमिट संबंधी उल्लंघन और बीमा कंपनी की तीसरे पक्ष के प्रति जिम्मेदारी को अलग-अलग माना गया है। बीमा कंपनी को पहले पीड़ितों के दावे का भुगतान करना होगा, जबकि परमिट के उल्लंघन के लिए मालिक और चालक से वसूली का अधिकार सुरक्षित रहेगा। दावेदारों की ओर से अधिवक्ता सुशील त्रिपाठी ने पैरवी की।
