वसीयत से मिली जमीन पर बेटी होने का दावा; दो बार आवेदन खारिज होने के बाद अपील में फिर मांगा DNA टेस्ट, हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में DNA टेस्ट की मांग को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी। जस्टिस संदीप एन भट्ट की अदालत ने कहा कि जब DNA जांच की मांग पहले ही ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी है और उन आदेशों को चुनौती भी नहीं दी गई, तो अपील के दौरान Order 41 Rule 27 CPC के तहत दोबारा वही राहत मांगना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी माना कि मामले में जिस महिला की DNA जांच कराने की मांग की जा रही है, वह मुकदमे की पक्षकार नहीं बल्कि तीसरी पक्षकार है। किसी व्यक्ति की सहमति के बिना DNA टेस्ट कराने का निर्देश उसकी निजता से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।
वसीयत से मिली जमीन, बेटी होने के दावे पर विवाद
मामला उस जमीन से जुड़ा है जिसे याचिकाकर्ताओं के अनुसार उन्हें 2016 में वसीयत के माध्यम से प्राप्त हुई थी। इसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम भी म्यूटेट हो गया था। वहीं, प्रतिवादी अमृताबाई ने दावा किया कि वह मृतक मूल स्वामी की बेटी और कानूनी वारिस है। उसका कहना था कि संपत्ति उसके नाम पर दर्ज होनी चाहिए। इसी दावे को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ताओं ने अमृताबाई के पारिवारिक संबंध पर सवाल उठाया और दावा किया कि वह पुनाजी की बेटी नहीं है।
DNA टेस्ट के जरिए रिश्तेदारी साबित करने की कोशिश
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अमृताबाई के वास्तविक माता-पिता चमेलीबाई और रामेश्वर हैं। इसी आधार पर उन्होंने अमृताबाई और चमेलीबाई का DNA टेस्ट कराने की मांग की। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि DNA रिपोर्ट से अमृताबाई के वास्तविक पारिवारिक संबंध स्पष्ट हो सकते हैं और उन्हें प्रतिवादी की ओर से पेश किए गए साक्ष्य का प्रभावी ढंग से खंडन करने का अवसर मिलेगा।
ट्रायल कोर्ट में दो बार खारिज हो चुकी थी मांग
हाईकोर्ट के समक्ष रिकॉर्ड में यह तथ्य सामने आया कि DNA जांच से संबंधित आवेदन पहले भी ट्रायल कोर्ट में दाखिल किए गए थे। 25 अक्टूबर 2017 और 9 अक्टूबर 2018 के आदेशों के जरिए धारा 45, साक्ष्य अधिनियम के तहत दायर आवेदन खारिज किए जा चुके थे। इन आदेशों को याचिकाकर्ताओं ने समय पर चुनौती नहीं दी। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने मामले में फैसला याचिकाकर्ताओं के खिलाफ सुनाया। अपील के दौरान उन्होंने फिर Order 41 Rule 27 CPC के तहत अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में DNA टेस्ट की अनुमति मांगी, जिसे निचली अपीलीय अदालत ने भी खारिज कर दिया।
स्कूल रिकॉर्ड में पुनाजी का नाम पिता के रूप में दर्ज
निचली अदालतों ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं ने खुद 13 अप्रैल 1972 का स्कूल प्रमाणपत्र रिकॉर्ड पर पेश किया था, जिसमें पुनाजी का नाम अमृताबाई के पिता के रूप में दर्ज था। अदालत ने पुराने स्कूल रिकॉर्ड को भी साक्ष्य के रूप में महत्व दिया और माना कि उपलब्ध दस्तावेज अमृताबाई के पुनाजी की बेटी होने के दावे को समर्थन देते हैं।
तीसरे व्यक्ति का DNA टेस्ट कराने पर निजता का सवाल
हाईकोर्ट ने DNA जांच की मांग के एक और महत्वपूर्ण पहलू पर ध्यान दिया। अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति का DNA टेस्ट कराने की मांग की जा रही है, वह मुकदमे में पक्षकार नहीं है। ऐसी स्थिति में किसी तीसरे व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध DNA जांच कराने का निर्देश देने से व्यक्तिगत निजता का सवाल उठता है। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में निजता के अधिकार को दिए गए संरक्षण को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने इस पहलू को भी महत्वपूर्ण माना।
बार-बार असफल प्रयास के बाद हाईकोर्ट ने नहीं किया हस्तक्षेप
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट के समक्ष DNA टेस्ट की मांग को लेकर दो बार असफल हो चुके थे और उन आदेशों को चुनौती भी नहीं दी गई थी। इसके बावजूद अपील के दौरान उसी राहत को Order 41 Rule 27 के जरिए दोबारा हासिल करने का प्रयास किया गया। हाईकोर्ट ने माना कि निचली अपीलीय अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और परिस्थितियों को देखते हुए अपने विवेकाधिकार का उचित इस्तेमाल किया है।
Article 227 के सीमित अधिकार में हस्तक्षेप से इनकार
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उसे निचली अदालतों के आदेशों में सीमित पर्यवेक्षी हस्तक्षेप का अधिकार है। इस मामले में ऐसा कोई आधार नहीं मिला जिससे उस अधिकार का इस्तेमाल कर निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई मामला नहीं बनाया गया है, जो Article 227 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को उचित ठहरा सके। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।
