इंदौर हाईकोर्ट ने 43 दस्तावेजों वाली सप्लीमेंट्री चार्जशीट की खारिज
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले में जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस वैधानिक जांच के अधिकारों का इस्तेमाल महज शिकायतकर्ता की ओर से दस्तावेज कोर्ट तक पहुंचाने के लिए नहीं कर सकती। जस्टिस जेके पिल्लई की कोर्ट ने कहा कि ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’ का अर्थ वास्तविक और स्वतंत्र जांच है, न कि शिकायतकर्ता के हाथ से दस्तावेज लेकर उन्हें सप्लीमेंट्री चार्जशीट के जरिए कोर्ट में पेश कर देना। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर इंदौर के स्पेशल जज (OAW) द्वारा 9 जनवरी 2025 को पारित आदेश और उसके आधार पर दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट को रद्द कर दिया। मामला 2004 में कथित दुष्कर्म और वर्ष 2021 में दर्ज FIR से जुड़ा है।
43 दस्तावेजों को लेकर शुरू हुआ विवाद
दुष्कर्म के आरोपों का सामना कर रहे याचिकाकर्ता सुनील ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ट्रायल कोर्ट के आदेश और उसके बाद की कार्यवाही को चुनौती दी थी। विवाद 43 अतिरिक्त दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिए जाने को लेकर था। अभियोजन पक्ष ने 12 नवंबर 2024 को CrPC की धारा 173(8) के तहत आवेदन पेश किया था। इसके बाद स्पेशल कोर्ट ने 9 जनवरी 2025 को अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इससे पहले शिकायतकर्ता ने स्वयं धारा 242 CrPC के तहत 43 दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने का आवेदन दिया था, जिसे ट्रायल कोर्ट ने मंजूर किया था। हाईकोर्ट ने 21 सितंबर 2024 को उस आदेश को निरस्त कर दिया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उसी प्रक्रिया को दूसरे रास्ते से आगे बढ़ाने के लिए पुलिस के माध्यम से सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कराई गई, जो गैर कानूनी है।
48 घंटे में दस्तावेज लेकर दाखिल कर दी सप्लीमेंट्री चार्जशीट
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और घटनाक्रम की टाइमलाइन पर विशेष ध्यान दिया। कोर्ट के मुताबिक, 25 जनवरी 2025 को जांच एजेंसी ने शिकायतकर्ता के पास से 43 दस्तावेज सीधे जब्त किए। उसी दिन उसका सप्लीमेंट्री बयान दर्ज किया गया और इसके महज दो दिन के भीतर 27 जनवरी 2025 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल कर दी गई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जिन दस्तावेजों को कथित तौर पर वर्षों पहले पुलिस अधिकारियों को दी गई शिकायतें और आधिकारिक पत्र बताया जा रहा है, उनकी स्वतंत्र रूप से जांच क्यों नहीं की गई।
‘सरकारी रिकॉर्ड’ की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं हुई?
हाईकोर्ट ने पाया कि जांच एजेंसी ने संबंधित पुलिस थानों अथवा पुलिस अधीक्षक कार्यालय से कथित मूल शिकायतों और आधिकारिक रिकॉर्ड को स्वतंत्र रूप से हासिल करने का प्रयास नहीं किया। कोर्ट ने कहा, यदि दस्तावेज वास्तव में पुलिस रिकॉर्ड अथवा आधिकारिक संचार से संबंधित थे, तो जांच एजेंसी को संबंधित सरकारी कार्यालयों से मूल रिकॉर्ड हासिल कर उनकी सत्यता की जांच करनी चाहिए थी। इसके बजाय शिकायतकर्ता से दस्तावेज लेकर उन्हें अदालत में प्रस्तुत कर दिया गया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- ‘पुलिस पोस्ट ऑफिस नहीं’
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सिर्फ शिकायतकर्ता के हाथ से दस्तावेज लेना और उन्हें 48 घंटे के भीतर सप्लीमेंट्री चार्जशीट के जरिए अदालत में भेज देना धारा 173(8) CrPC के तहत ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’ की वैधानिक आवश्यकता पूरी नहीं करता। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को प्रथम दृष्टया ऐसा यांत्रिक अभ्यास माना, जिसका उद्देश्य उसके 21 सितंबर 2024 के पहले आदेश में सामने आई प्रक्रियात्मक कमी को दूर करने के बजाय उसे दरकिनार करना प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी वैधानिक शक्तियों की आड़ में शिकायतकर्ता के लिए महज ‘पोस्ट ऑफिस’ की तरह काम नहीं कर सकती।
चार्ज फ्रेम होने के बाद ऐसी कार्रवाई से आरोपी को नुकसान
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि चार्ज फ्रेम होने के काफी समय बाद इस तरह की प्रक्रिया अपनाने से याचिकाकर्ता को गंभीर पूर्वाग्रह हो सकता है और यह अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि वह मामले के मूल आरोपों अथवा केस के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है।
ट्रायल कोर्ट का आदेश और सप्लीमेंट्री चार्जशीट दोनों रद्द
सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर कर ली। कोर्ट ने इंदौर के स्पेशल जज (OAW) द्वारा 9 जनवरी 2025 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उक्त आदेश के आधार पर दाखिल की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट को भी खारिज कर दिया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘फर्दर इन्वेस्टिगेशन’ के नाम पर केवल शिकायतकर्ता से दस्तावेज लेकर अदालत में पेश करना पर्याप्त नहीं है। जांच एजेंसी को स्वतंत्र, वास्तविक और सत्यापन आधारित जांच करनी होगी।
