हाईकोर्ट ने जवाब पेश करने सरकार को दी 2 सप्ताह की मोहलत
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मऊगंज जिले में प्रस्तावित प्रशासनिक भवनों के निर्माण के लिए आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मकान तोड़े जाने की कार्रवाई पर लगाई गई अंतरिम रोक को फिलहाल जारी रखा है। अदालत ने राज्य सरकार को मामले में जवाब पेश करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
जस्टिस प्रणय वर्मा और जस्टिस जे.के. पिल्लई की वेकेशन बेंच ने सोमवार को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक बेदखली और तोड़फोड़ की कार्रवाई पर पूर्व में दिया गया अंतरिम संरक्षण जारी रहेगा। मामले की अगली सुनवाई 16 जून को निर्धारित की गई है।
प्रशासनिक भवन निर्माण के लिए हो रही थी बेदखली
जनहित याचिका मऊगंज जिले के शहपुरा थाना क्षेत्र स्थित ग्राम बलभद्रगढ़ निवासी पूर्व जनपद सदस्य बसंत लाल कोल की ओर से दायर की गई है।
याचिका में कहा गया है कि ग्राम घुरेहटा कला (वार्ड क्रमांक 11) में अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार दशकों से निवास कर रहे हैं। इन परिवारों के कब्जे को स्वयं शासन द्वारा मान्यता दी गई थी और उन्हें भूमि के पट्टे भी आवंटित किए गए थे।
सरकारी योजनाओं से बने पक्के मकान
याचिकाकर्ता का कहना है कि संबंधित परिवारों को विभिन्न सरकारी आवास योजनाओं का लाभ मिला था, जिसके तहत उन्होंने अपने पक्के मकान निर्मित किए। इसके बावजूद प्रशासन जिला कार्यालय और अन्य प्रशासनिक भवनों के निर्माण के लिए उन्हें हटाने की कार्रवाई कर रहा है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था, पुनर्वास योजना या विधिक प्रक्रिया का पालन किए जेसीबी मशीनों की मदद से मकानों को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया, जो संविधान और कानून के प्रावधानों के विपरीत है।
पुनर्वास से पहले बेदखली पर रोक की मांग
जनहित याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि जब तक प्रभावित आदिवासी और गरीब परिवारों के लिए सम्मानजनक पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था नहीं की जाती, तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली अथवा तोड़फोड़ की कार्रवाई पर रोक लगाई जाए।
हाईकोर्ट ने बरकरार रखा अंतरिम संरक्षण
मामले में बीते शुक्रवार को हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तत्काल राहत देते हुए बेदखली की कार्रवाई पर रोक लगाई थी। सोमवार को हुई सुनवाई में अदालत ने उस अंतरिम आदेश को जारी रखते हुए राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नित्यानंद मिश्रा ने पैरवी की। वहीं राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित, ब्रम्हदत्त सिंह हाजिर हुए।
मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला केवल भूमि विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी अधिकारों, पुनर्वास नीति और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश यह सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि प्रभावित परिवारों को उचित पुनर्वास दिए बिना उन्हें बेघर न किया जाए।
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-19191-2026
