हाईकोर्ट के फर्जी दस्तावेज बनाकर निचली अदालत में पेश करने का है आरोप
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के नाम पर कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कर न्यायालय को गुमराह करने के आरोप में घिरे तीन महिलाओं समेत पांच आरोपियों को जिला अदालत से बड़ा झटका लगा है। जबलपुर के दसवें अपर सत्र न्यायाधीश Sanjog Singh Waghela ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी आरोपियों की अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) याचिकाएं खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट के नाम पर बनाए गए थे कथित फर्जी दस्तावेज
अभियोजन के अनुसार, फरियादी वीरेंद्र पांडेय ने 15 मई 2023 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को शिकायत प्रस्तुत की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ व्यक्तियों ने सत्र न्यायालय में लंबित एक पुनरीक्षण याचिका में अनुचित लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के नाम से फर्जी एवं कूटरचित दस्तावेज तैयार किए और उनका उपयोग किया।
जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि कथित तौर पर नोटिस और पावती (Acknowledgement) की कूट रचना कर उन्हें असली दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।
हाईकोर्ट के आदेश पर दर्ज हुई एफआईआर
शिकायतकर्ता का आरोप था कि मामले में ओमती थाना पुलिस द्वारा उचित कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट द्वारा 8 अप्रैल 2026 को पारित आदेश के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया और जांच शुरू की।
गिरफ्तारी से बचने दायर की थी अग्रिम जमानत याचिका
मामले में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए नरसिंहपुर जिले के बरमान निवासी:
- शिल्पा पाण्डेय
- मधुलता दुबे
- शिवांक दुबे
तथा जबलपुर निवासी:
- शिवानी चतुर्वेदी
- अनूप चतुर्वेदी
ने अग्रिम जमानत के लिए जिला अदालत में आवेदन प्रस्तुत किया था।
अदालत ने माना गंभीर अपराध
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक आरके गुप्ता ने जमानत का विरोध किया। वहीं शिकायतकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजकुमार सोनी ने दलीलें प्रस्तुत कीं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि मामला न्यायिक दस्तावेजों की कथित कूटरचना और न्यायालय को गुमराह करने जैसे गंभीर आरोपों से जुड़ा है। ऐसे में आरोपियों को अग्रिम जमानत का लाभ नहीं दिया जा सकता।
क्यों अहम है मामला?
यह मामला न्यायिक संस्थाओं के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उनका उपयोग कर अदालत की प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोपों से जुड़ा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रभाव डालने वाला अपराध माना जाएगा।
