LAW'S VERDICT

रेलवे की 'सिस्टमेटिक लापरवाही' ने ली यात्री की जान: 139 पर गिड़गिड़ाता रहा परिवार!

हाईकोर्ट में दाखिल PIL में आरोप, ट्रेनों और स्टेशनों पर जवाबदेह इमरजेंसी सिस्टम बनाने की मांग, नोटिस जारी 

जबलपुर।  भारतीय रेलवे के 'स्वर्ण युग' और 'हाई-टेक' होने के दावों की पोल खोलती एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। लखनऊ से जबलपुर की यात्रा कर रहे 62 वर्षीय एक स्वस्थ यात्री संजय जैन की केवल इसलिए मृत्यु हो गई क्योंकि भारतीय रेलवे का तंत्र उन्हें समय पर एक प्राथमिक उपचार तक उपलब्ध नहीं करा सका। इस मामले में अब पीड़ित पुत्र अक्षत जैन ने जनहित याचिका (PIL) दायर कर रेलवे प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है। याचिका में राहत चाही गई है कि ट्रेनों और स्टेशनों पर एक 'जवाबदेह इमरजेंसी रिस्पांस मैकेनिज्म' बनाया जाए, ताकि भविष्य में किसी और का पिता सिस्टम की इस 'चुप्पी' और 'लापरवाही' के कारण दम न तोड़े। 
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने इस जनहित याचिका पर केन्द्र सरकार और रेलवे विभाग से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 15 जून को निर्धारित की गई है।

ट्रेन में बिगड़ी थी यात्री की तबीयत, नहीं मिला तत्काल इलाज

यह जनहित याचिका जबलपुर के गोलबाजार निवासी अक्षत जैन की ओर से दायर की गई है। याचिका के अनुसार, उनके पिता संजय जैन (62 वर्ष) 6 दिसंबर 2024 को चित्रकूट एक्सप्रेस  में यात्रा कर रहे थे।

रात करीब 1:15 बजे उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई, लेकिन ट्रेन में समय पर प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकी। आरोप है कि पर्याप्त मेडिकल सहायता नहीं मिलने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।

याचिका में मांग की गई है कि लंबी दूरी की ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर एक “जवाबदेह इमरजेंसी रिस्पांस मैकेनिज्म” तैयार किया जाए, ताकि भविष्य में यात्रियों की जान चिकित्सा सहायता के अभाव में न जाए।

सतना में TTE बोला- "यहाँ कोई इलाज नहीं है"

याचिका के अनुसार, 1:24 से 1:45 बजे के बीच परिवार बार-बार फोन करता रहा, लेकिन रेलवे की नींद नहीं टूटी। 1:48 बजे उसके पिता बेहोश हो गए। करीब 2:02 बजे जब ट्रेन सतना पहुँची, तो परिवार को उम्मीद थी कि डॉक्टर इंतज़ार कर रहे होंगे। लेकिन हद तो तब हो गई जब ऑन-बोर्ड TTE ने साफ़ कह दिया कि सतना में चिकित्सा सहायता की कोई व्यवस्था नहीं है।

अमानवीयता की पराकाष्ठा: न स्ट्रेचर मिला, न रेलवे स्टाफ आया

रेलवे की इस बेरुखी के बाद यात्रियों ने चेन पुलिंग कर ट्रेन को आउटर पर रोका। हैरान करने वाली बात यह है कि भारतीय रेलवे चिकित्सा नियमावली (IRMM 2000) के स्पष्ट नियमों के बावजूद:

• गंभीर मरीज के लिए 30 मिनट तक स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं कराया गया।

• RPF और रेलवे स्टाफ मूकदर्शक बना रहा; परिजनों ने खुद यात्री को उठाकर प्लेटफॉर्म तक पहुँचाया।

• रेलवे की एम्बुलेंस नहीं आई, परिजनों को खुद निजी 'रेड एम्बुलेंस' बुलानी पड़ी, जिसने मदद से पहले पैसों की मांग की।

• अंततः इलाज के अभाव में यात्री ने दम तोड़ दिया। अस्पताल पहुँचने पर उन्हें 'ब्रॉट डेड' घोषित कर दिया गया।

क्या पटरियों पर जान सस्ती है?

याचिका में हाल ही की अन्य घटनाओं का भी हवाला दिया गया है:

1. मई 2025: पुणे-हावड़ा एक्सप्रेस में एक पूर्व रेलवे कर्मचारी की बिना इलाज मौत।

2. जून 2025: हाई-प्रोफाइल 'वंदे भारत' में भी चिकित्सा सुविधा न होने से यात्री ने तोड़ा दम।

3. चेन्नई-पलक्कड़ एक्सप्रेस: बर्थ गिरने से घायल महिला को प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं हुआ।

कोर्ट से न्याय की गुहार

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि इंडियन रेलवे मेडिकल मैनुअल (IRMM) और रेलवे बोर्ड के सर्कुलर केवल कागजों तक सीमित न रहें। ट्रेनों और स्टेशनों पर एक 'जवाबदेह इमरजेंसी रिस्पांस मैकेनिज्म' बनाया जाए, ताकि भविष्य में किसी और का पिता सिस्टम की इस 'चुप्पी' और 'लापरवाही' के कारण दम न तोड़े। मामले पर सोमवार को हुई प्रारंभिक सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रोहन हर्णे ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद बेंच ने कहा कि चाही गई राहत में से मुआवजा की राहत हटाकर याचिकाकर्ता नई याचिका 3 दिन में दाखिल करे। उस संशोधित याचिका पर केन्द्र सरकार और रेलवे विभाग अपने-अपने जवाब दाखिल करें। 

बड़ा सवाल: जब करोड़ों के विज्ञापन और हाई-स्पीड ट्रेनों का दावा किया जाता है, तो क्या ₹139 के टैक्स में यात्री की जान की कीमत शामिल नहीं है?

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