जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी संस्था को बिना सुनवाई का अवसर दिए ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता। अदालत ने रीवा कलेक्टर द्वारा पारित उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक सहकारी समिति को सीधे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था। जस्टिस संदीप एन भट्ट की एकलपीठ ने कहा कि प्रशासनिक कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Natural Justice) का पालन अनिवार्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि-
- पहले याचिकाकर्ता को शोकॉज नोटिस (कारण बताओ नोटिस) दिया जाए। फिर उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए। इसके बाद ही कोई भी कार्रवाई की जाए।
सहकारी समिति से जुड़ा था मामला
यह मामला रघुराजनगर तहसील स्थित सेवा सहकारी समिति से जुड़ा था। समिति के मैनेजर सतीश पाण्डेय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि धान खरीदी में कथित गड़बड़ी के आरोप में कलेक्टर ने बिना सुनवाई के ही समिति को ब्लैकलिस्ट कर दिया। इससे समिति को आगामी अनाज खरीदी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
अब क्या कमाएंगे और क्या खाएंगे?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता स्वप्निल सोहगौरा ने तर्क दिया कि धान खरीदी से होने वाली आय ही समिति सदस्यों की मुख्य आजीविका है। अब ब्लैकलिस्टिंग की एकतरफा कार्रवाई के बाद सदस्य क्या कमाएंगे और क्या खाएंगे? बिना सुनवाई का मौका दिए की गई यह कार्रवाई अवैधानिक और मनमानी है।
कोर्ट ने भी माना कार्रवाई एकतरफा
सुनवाई के बाद दिए फैसले में अदालत ने माना कि 6 नवंबर 2025 के ब्लैकलिस्टिंग के आदेश से पहले याचिकाकर्ता को न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया। इसे गंभीर त्रुटि मानते हुए हाईकोर्ट ने रीवा कलेक्टर का आदेश निरस्त (quash) कर दिया।
क्या है इस फैसले का महत्व?
यह फैसला प्रशासनिक कार्यवाहियों में निष्पक्षता और पारदर्शिता को मजबूत करता है।
संदेश साफ है- “बिना सुने किसी को दंडित नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट का आदेश देखें WP-8865-2026
