39 अयोग्य छात्रों को MBBS में प्रवेश का आरोप
“सिर्फ समिति सदस्य होना बचाव नहीं”
आवेदक डॉ. सक्सेना की ओर से दलील दी गई कि वह केवल समिति का सदस्य था और किसी आपराधिक मंशा (mens rea) का आरोप नहीं बनता। इस पर हाईकोर्ट ने कहा- यह तय करना कि मामला साजिश का है या घोर लापरवाही का, तथ्यात्मक विवाद है, जिसका फैसला ट्रायल में होगा। धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट तथ्यों की गहन जांच या बचाव पक्ष की दलीलों पर विचार नहीं कर सकता।
अजय गोयनका केस से अलग बताया मामला
अपने फैसले में डिवीज़न बेंच ने स्पष्ट किया कि यह प्रकरण पहले के कुछ मामलों से अलग है, क्योंकि यहां समिति की जिम्मेदारी स्पष्ट थी। समिति द्वारा दस्तावेजों की जांच नहीं की गई और अंतिम दिन योजनाबद्ध तरीके से प्रवेश दिए गए, इसलिए FIR रद्द करने का आधार नहीं बनता। न्यायालय ने कहा कि इस स्तर पर रोविंग इन्क्वायरी भी संभव नहीं। ट्रायल के दौरान अभियुक्त अपना बचाव कर सकते हैं। आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, इसलिए उसके खिलाफ प्रोसेक्यूशन जारी रहेगा।
छात्रों को भी नहीं मिली राहत, 8 याचिकाएं खारिज
इसी तरह MBBS 2011 कोर्स में दाखिला लेने वाले अयोग्य छात्रों की ओर से दाखिल कुल 8 याचिकाएं भी जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनिल वर्मा की डिवीज़न बेंच ने खारिज कर दी हैं। व्यापम से जुड़े MBBS एडमिशन घोटाले से जुड़े इस मामले में बेंच ने स्पष्ट किया है कि डॉ. अजय गोयनका प्रकरण में दिए गए कारण इस मामले पर लागू नहीं होते। कोर्ट ने माना कि यहां कॉलेज प्रबंधन और अभ्यर्थियों के बीच साजिश (Conspiracy) के प्रथम दृष्टया संकेत मौजूद हैं, इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता है। कोर्ट ने कहा कि जिन उम्मीदवारों को कम अंकों के कारण काउंसलिंग में कोई कॉलेज आवंटित नहीं हुआ, उनसे फीस अगस्त 2011 में ही जमा करा ली गई, जबकि उस समय सीटें रिक्त घोषित भी नहीं हुई थीं। हाईकोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा- साजिश कभी खुले में नहीं होती, बल्कि पक्षकारों के आचरण से उसका पता चलता है। बेंच ने कहा- यदि छात्रों का प्रवेश ईमानदारी से हुआ होता तो सीट खाली घोषित होने से पहले फीस क्यों ली गई? काउंसलिंग से कॉलेज आवंटन न होने के बावजूद एडमिशन कैसे दे दिया गया? कोर्ट ने माना कि इससे कॉलेज प्रबंधन और उम्मीदवारों के बीच पूर्व समझ (Understanding) के संकेत मिलते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि तथ्यात्मक विवादों का निपटारा ट्रायल के दौरान होगा और धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट सबूतों का मूल्यांकन नहीं कर सकता। इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने छात्रों की ओर से दाखिल सभी 9 याचिकाएं खारिज कर दीं।
