29 याचिकाएं खारिज, हाईकोर्ट से लीज धारकों को बड़ा झटका
जबलपुर/इंदौर।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खनन पट्टाधारकों को बड़ा झटका देते हुए डेड रेंट की वसूली को पूरी तरह वैध ठहराया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने डेड रेंट की मांग को चुनौती देने वाली 29 याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही डेड रेंट वसूली पर दी गई अंतरिम राहत भी समाप्त कर दी गई।
कोर्ट का साफ संदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि खनन शुरू न होने, या नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) द्वारा रोक लगाए जाने की स्थिति में भी, जब तक लीज विधिवत लैप्स घोषित नहीं होती, तब तक पट्टाधारकों को डेड रेंट देना ही होगा।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ता खनिज पट्टाधारकों ने तर्क दिया कि—
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उन्होंने वर्ष 2012 में क्वैरी लीज नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था,
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2013 में 10 वर्षों के लिए स्वीकृति मिली,
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पर्यावरणीय स्वीकृति 2014 में प्राप्त हुई,
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इसी बीच NGT ने बिना पर्यावरण मंजूरी वाले खनन पर रोक लगा दी।
उनका कहना था कि जब खनन शुरू ही नहीं हो सका और भू-प्रवेश (actual possession) भी नहीं मिला, तो डेड रेंट की मांग मनमानी और अवैध है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि यह नया पट्टा नहीं, बल्कि डीम्ड रिन्यूअल का मामला है। ऐसे मामलों में—
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सभी वैधानिक स्वीकृतियां समय पर लेना पट्टाधारी की जिम्मेदारी है,
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न तो समय पर लीज लैप्स घोषित कराने का आवेदन किया गया,
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न ही नियमों का पालन हुआ।
इसलिए डेड रेंट देय है।
MDMR Act बना कानूनी आधार
सुरक्षित रखा फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि एमएमडीआर अधिनियम की धारा 9-A के तहत डेड रेंट न्यूनतम गारंटी है, जो रॉयल्टी से अलग और स्वतंत्र प्रावधान है। कोर्ट ने दो टूक कहा- “जब तक लीज विधिवत लैप्स घोषित नहीं होती, तब तक डेड रेंट से छूट नहीं मिल सकती।”
क्यों अहम है यह फैसला
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खनन पट्टाधारकों के लिए महत्वपूर्ण नजीर,
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डेड रेंट को लेकर चल रहे विवादों पर स्पष्टता,
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पर्यावरणीय मंजूरी या NGT रोक के बावजूद वित्तीय दायित्व तय।
