वकील पर झूठे आरोप लगाकर हासिल की अंतरिम राहत, जांच में खुली पोल; अदालत ने कहा- निजी विवाद निपटाने के लिए नहीं है अनुच्छेद 226 का मंच
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर |
रेत खनन ठेकेदार को घेरने और उसका अनुबंध निरस्त कराने की कोशिश याचिकाकर्ता को भारी पड़ गई। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शहडोल और सिंगरौली में रेत खनन का ठेका संचालित करने वाली सहकार ग्लोबल लिमिटेड के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीज़न बेंच ने पाया कि निजी व्यावसायिक विवाद को लेकर न्यायालय की प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया और प्रतिवादी के अधिवक्ता पर लगाए गए आरोप जांच में सही नहीं पाए गए।हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को भी भविष्य में दूसरे पक्ष के खिलाफ ऐसे आरोप लगाने से बचने की चेतावनी दी, जिनका उद्देश्य अदालत की धारणा को प्रभावित करना हो।
17 कथित फर्जी ETP का आरोप, ठेका रद्द कराने की थी साजिश?
सीधी निवासी व्यवसायी मनीष सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सहकार ग्लोबल लिमिटेड के खिलाफ जांच कराने और उसके खनन अनुबंध निरस्त करने की मांग की थी। कंपनी को शहडोल और सिंगरौली जिलों में रेत खनन, भंडारण, परिवहन और बिक्री के लिए माइन डेवलपर-कम-ऑपरेटर नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि कंपनी ने उसके ट्रक के नाम पर 17 फर्जी ई-ट्रांजिट पास (ETP) जारी किए, जबकि वाहन तकनीकी खराबी के कारण करीब एक महीने से बंद था। इसी आधार पर उसने कंपनी के खिलाफ कार्रवाई और ठेका निरस्त करने की मांग की।
अदालत में वकील पर लगाए गंभीर आरोप, जांच में निकले बेबुनियाद
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने प्रतिवादी कंपनी के वकील पर बार-बार मेंशन कर सुनवाई टलवाने का आरोप लगाया। दावा किया गया कि ऐसा सिंगरौली क्षेत्र में पड़ी रेत हटाने का मौका देने के लिए किया जा रहा है। हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को मामले की जांच प्रधान रजिस्ट्रार (न्यायिक) को सौंपते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। 22 अगस्त 2026 की जांच रिपोर्ट में प्रतिवादी के अधिवक्ता शोएब हसन खान के खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं पाए गए। इसके बाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता शोएब हसन खान को क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ पूर्व में की गई प्रतिकूल टिप्पणियां वापस लेते हुए जांच की कार्यवाही समाप्त कर दी। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ और राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने दलीलें रखीं।
झूठे आरोपों से राहत हासिल करने पर हाईकोर्ट सख्त
अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत हासिल करने के लिए प्रतिवादी के अधिवक्ता के खिलाफ गलत आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अखिल सिंह को चेतावनी दी कि भविष्य में अदालत को प्रभावित करने के उद्देश्य से ऐसे आरोप न लगाए जाएं। इस कृत्य के लिए याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये की लागत लगाई गई।
निजी विवाद को जनहित का चोला पहनाने की कोशिश
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि विवाद मुख्य रूप से याचिकाकर्ता और कंपनी के बीच ट्रकों के परिवहन कार्य को लेकर था। कंपनी ने अदालत में कहा कि संबंधित ट्रक देवी सिंह ने DS ग्रुप के माध्यम से परिवहन कार्य में लगाया था, न कि याचिकाकर्ता ने। कंपनी ने यह भी बताया कि 15 जनवरी 2024 से 28 सितंबर 2025 के बीच कुल 2,93,797 ETP जारी किए गए, जिनमें से केवल 17 विवादित हैं। कंपनी के अनुसार, इन ETP के लिए सरकार को रॉयल्टी का भुगतान किया गया था।
277 करोड़ की रॉयल्टी का दावा, सरकार ने भी नहीं उठाया सवाल
कंपनी ने अदालत को बताया कि लगभग 20 महीने के संचालन के दौरान उसने राज्य सरकार को 277 करोड़ रुपये की रॉयल्टी का भुगतान किया है। कंपनी ने यह भी दावा किया कि राज्य सरकार की ओर से ETP जारी करने से पहले रॉयल्टी जमा नहीं करने का कोई आरोप नहीं लगाया गया। हाईकोर्ट ने माना कि कथित अनियमितताओं की जांच खनन कानूनों और अनुबंध की शर्तों के तहत सक्षम प्राधिकारी कर सकता है। निजी संविदात्मक विवाद के आधार पर याचिकाकर्ता को ठेका निरस्त कराने का अधिकार नहीं है।
एक के बाद एक शिकायतें, अदालत ने माना दबाव बनाने का प्रयास
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने कंपनी के खिलाफ आपराधिक शिकायत, रिट याचिका और अवमानना आवेदन सहित कई कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लिया। अदालत के अनुसार, इन परिस्थितियों से प्रतीत होता है कि प्रतिवादी कंपनी पर दबाव बनाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता का डेविड सिंह उर्फ कन्हैया सिंह चंदेल से कथित संबंध होने का आरोप लगाया गया था, जिसका याचिकाकर्ता ने जवाबी हलफनामे में खंडन नहीं किया।
हाईकोर्ट की दो टूक टिप्पणी- याचिकाकर्ता स्वच्छ हाथों से नहीं आया
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के किसी मौलिक या वैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है। वह निजी विवाद को निपटाने के उद्देश्य से अदालत आया और उसने स्वच्छ हाथों से न्यायालय का रुख नहीं किया। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
याचिका खारिज, चार सप्ताह में जमा करने होंगे 50 हजार रुपये
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कुल 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। इसमें 25 हजार रुपये झूठे आरोपों के लिए और 25 हजार रुपये निराधार याचिका दायर करने के लिए शामिल हैं। याचिकाकर्ता को जुर्माने की पूरी राशि चार सप्ताह के भीतर मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर में जमा करनी होगी।
