LAW'S VERDICT

शाही मस्जिद के हिस्से को तोड़ने के खिलाफ याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा- सिंहस्थ 2028 के लिए सड़क चौड़ीकरण जरूरी

उज्जैन की शाही मस्जिद के जमातखाना, मीनार और मजार चौक के हिस्से को हटाने की नगर निगम की कार्रवाई को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं निरस्त

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।

उज्जैन की शाही मस्जिद के एक हिस्से को सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाने के नगर निगम के फैसले को चुनौती देने वाली दोनों याचिकाएं मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दी हैं। जस्टिस संदीप एन भट्ट की कोर्ट ने माना कि 15 मीटर चौड़ी सड़क के विस्तार के लिए मस्जिद की संपत्ति का एक छोटा हिस्सा हटाना आवश्यक है और नगर निगम ने विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिया था।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई को मनमाना, भेदभावपूर्ण या संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-ए का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने सिंहस्थ कुंभ 2028 के दौरान करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही, यातायात प्रबंधन और सार्वजनिक सुरक्षा की आवश्यकताओं को भी महत्वपूर्ण माना।

दो अलग-अलग याचिकाओं में नगर निगम की कार्रवाई को दी गई थी चुनौती

शाही मस्जिद वक्फ पंचायत मोचियान की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि अशफाक अहमद एवं अन्य तथा अध्यक्ष अरशान हुसैन की ओर से दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थीं। दोनों याचिकाओं में नगर निगम द्वारा जारी 14 अगस्त, 25 अगस्त, 27 अगस्त 2026 के नोटिस और 1 सितंबर 2026 के अंतिम नोटिस/आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि इन नोटिसों को निरस्त किया जाए और नगर निगम सहित संबंधित अधिकारियों को मस्जिद के किसी भी हिस्से को ध्वस्त करने जैसी दंडात्मक कार्रवाई से रोका जाए। चूंकि दोनों याचिकाओं में मूल चुनौती एक ही कार्रवाई को लेकर थी, इसलिए हाईकोर्ट ने उन्हें एक साथ सुनकर साझा आदेश पारित किया।

मस्जिद के जमतखाना, 120 फीट ऊंची मीनार और मजार चौक पर था विवाद

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शाही मस्जिद एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जो पीढ़ियों से अस्तित्व में है और वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत है। नगर निगम की प्रस्तावित कार्रवाई से मस्जिद के जमतखाने, लगभग 120 फीट ऊंची मीनार और सड़क की ओर स्थित मजार चौक का हिस्सा प्रभावित होगा। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मस्जिद में बड़ी संख्या में श्रद्धालु नमाज अदा करते हैं। उनके अनुसार, प्रस्तावित तोड़फोड़ से धार्मिक गतिविधियों और नमाजियों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता तथा धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों का हवाला देते हुए कार्रवाई को असंवैधानिक बताया।

आसपास की संपत्तियों को छोड़ने पर उठाया भेदभाव का सवाल

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि मस्जिद के आसपास स्थित कुछ अन्य संपत्तियों को नगर निगम ने कथित तौर पर ऐतिहासिक संरचना बताकर कार्रवाई से अलग रखा है, जबकि सड़क चौड़ीकरण के उद्देश्य से उन संपत्तियों का भी प्रभावित होना आवश्यक है। उनकी ओर से सवाल उठाया गया कि यदि सड़क विस्तार के लिए अन्य संपत्तियों को भी हटाना जरूरी है, तो केवल मस्जिद के हिस्से को निशाना क्यों बनाया जा रहा है। इस संबंध में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले गुलाम कादर अहमदभाई मेमन एवं अन्य बनाम सूरत नगर निगम एवं अन्य का भी हवाला दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा- सुनवाई के बाद पारित हुआ आदेश

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने घटनाक्रम और नगर निगम की ओर से प्रस्तुत दलीलों पर विचार किया। कोर्ट ने पाया कि मस्जिद का प्रबंधन करने का दावा करने वाले पदाधिकारियों को सुनवाई का अवसर दिया गया था और उनकी आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही विवादित आदेश पारित किया गया। कोर्ट ने कहा कि सड़क चौड़ीकरण व्यापक जनहित से जुड़ा विकास कार्य है। मौजूदा सड़क के विस्तार में मस्जिद की संपत्ति का एक छोटा हिस्सा बाधक है, जिसे हटाना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में, जब प्राधिकरण अन्य उपलब्ध विकल्पों पर विचार करते हुए किसी संपत्ति या ऐतिहासिक-धार्मिक संरचना को बचाने का प्रयास करता है, तो केवल इस आधार पर कार्रवाई को अनुचित या पक्षपातपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

वैकल्पिक मार्ग का तर्क भी हाईकोर्ट ने किया खारिज

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह सुझाव भी दिया गया था कि मस्जिद के हिस्से को हटाने के बजाय सड़क के सामने स्थित बगीचे या व्यावसायिक संपत्ति की भूमि का उपयोग किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने स्थल की स्थिति और सड़क विस्तार की आवश्यकता पर विचार करते हुए इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में वैकल्पिक तरीके से सड़क चौड़ीकरण किए जाने की गुंजाइश नहीं है।

याचिकाकर्ताओं के अधिकार और लोकस स्टैंडी पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि मामले में कई तथ्य विवादित हैं, जिनमें याचिकाकर्ताओं की याचिका दायर करने की पात्रता और संपत्ति के संबंध में उनका विधिक अधिकार भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा, विशेषकर तब जब मामला व्यापक सार्वजनिक हित से जुड़ा हो। कोर्ट ने उज्जैन विकास योजना 2035 का उल्लेख करते हुए कहा कि नगर निगम आवश्यक वैधानिक प्रावधानों का पालन कर कार्रवाई करने के लिए सक्षम है।

सिंहस्थ 2028, यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा को बताया महत्वपूर्ण

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि समय के साथ शहर की आबादी बढ़ी है और आगामी सिंहस्थ कुंभ 2028 में करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही को ध्यान में रखते हुए बेहतर सुविधाएं और यातायात प्रबंधन सुनिश्चित करना आवश्यक है। मस्जिद का परिसर महाकालेश्वर मंदिर के लगभग सामने और क्षिप्रा नदी के निकट स्थित है। ऐसे में सार्वजनिक सुरक्षा और व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई को आवश्यक माना गया। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर नगर निगम की कार्रवाई को मनमाना, अन्यायपूर्ण या असंवैधानिक नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर विचार करने के बाद आदेश पारित किया गया था, इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

दोनों याचिकाएं निराधार मानकर खारिज

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को गुणहीन मानते हुए खारिज कर दिया। इस प्रकार उज्जैन की शाही मस्जिद के हिस्से को सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाने संबंधी नगर निगम की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाओं में याचिकाकर्ताओं को राहत नहीं मिली।


हाईकोर्ट का आदेश देखें       WP-37147-2026

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