LAW'S VERDICT

13 आरोपी हो चुके बरी, शिकायतकर्ता का यू-टर्न और फिर समझौता… हाईकोर्ट से सतीश सनपाल व उसकी पत्नी सोनिया बरी

ऑनलाइन जुए के मामले में सनपाल दंपत्ति को बड़ी राहत, जबलपुर हाईकोर्ट ने निरस्त की आपराधिक कार्यवाही

लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर।

जबलपुर के चर्चित ऑनलाइन जुए और धोखाधड़ी मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सतीश सनपाल और उसकी पत्नी सोनिया को बड़ी राहत दी है। जस्टिस हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने लॉर्डगंज थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 356/2022 से संबंधित दोनों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और उससे जुड़ी सभी कार्रवाइयों को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर गौर करते हुए कहा कि एक ही मुकदमे में कुल 15 आरोपियों में से 13 पहले ही बरी हो चुके हैं। शिकायतकर्ता ने ट्रायल कोर्ट में अभियोजन का समर्थन नहीं किया और बाद में दोनों आवेदकों के साथ स्वेच्छा से समझौता भी कर लिया। इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर शेष आरोपियों के दोषसिद्ध होने की संभावना अत्यंत कम रह जाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के बजाय न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। हालांकि, यह राहत केवल सतीश सनपाल और सोनिया तथा इसी अपराध तक सीमित रखी गई है।

राज्य ने नहीं दी लिखित सिनॉप्सिस, केस डायरी भी रही नदारद

हाईकोर्ट ने आदेश में उल्लेख किया कि 24 सितंबर 2026 को विस्तृत सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रखा गया था। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से लिखित सिनॉप्सिस पेश करने के लिए एक-दो दिन का समय मांगा गया था। हालांकि, 28 सितंबर को आदेश लिखे जाने तक राज्य की ओर से कोई लिखित सिनॉप्सिस रिकॉर्ड पर प्रस्तुत नहीं की गई। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि बार-बार कहने के बावजूद राज्य केस डायरी पेश करने में विफल रहा। ऐसे में हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध याचिकाओं, दस्तावेजों, दलीलों और अन्य सामग्री के आधार पर निर्णय किया।

2022 में दर्ज हुआ था जुआ और धोखाधड़ी का मामला

अभियोजन के अनुसार, शिकायतकर्ता प्रमोद रजक ने 10 जून 2022 को अमित शर्मा, सतीश सनपाल और विवेक पांडे के खिलाफ लिखित शिकायत दी थी। इसके आधार पर लॉर्डगंज थाने में अपराध दर्ज किया गया। 18 अक्टूबर 2022 को भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया। बाद में पूरक आरोपपत्रों के माध्यम से अन्य व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया, जिनमें सतीश सनपाल और उसकी पत्नी सोनिया शामिल थे। मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 120-बी, 467 और 468 तथा जुआ अधिनियम की धारा 4-ए के तहत अपराधों का उल्लेख था।

एक ही मुकदमे में 15 में से 13 आरोपी बरी

हाईकोर्ट के समक्ष यह महत्वपूर्ण तथ्य आया कि इसी मुकदमे में सह-आरोपी अमित शर्मा और मनोज सनपाल को 23 जनवरी 2024 के फैसले से बरी किया जा चुका था। इसके बाद 24 दिसंबर 2025 को अन्य सह-आरोपियों, जिनमें आवेदक सोनिया के माता-पिता भी शामिल थे, को भी दोषमुक्त कर दिया गया। इस प्रकार कुल 15 आरोपियों में से 13 को ट्रायल कोर्ट पहले ही बरी कर चुका था। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य की ओर से ऐसा कोई तथ्य प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे पता चले कि इन फैसलों को अभियोजन ने सक्षम अपीलीय अदालत में चुनौती दी है। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि 13 आरोपियों का बरी होना अपने आप में शेष आरोपियों को राहत देने का स्वतः आधार नहीं है। इस तथ्य पर अन्य परिस्थितियों के साथ विचार किया गया।

शिकायतकर्ता ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया

सतीश और सोनिया सनपाल की ओर से अधिवक्ता विपिन यादव और रौनक यादव ने दलील दी कि आवेदकों को बाद में मामले में आरोपी बनाया गया और उनके खिलाफ कथित अपराधों से जोड़ने वाली कोई विशिष्ट सामग्री नहीं है। यह भी कहा गया कि वे संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे थे और सतीश सनपाल वर्ष 2019 के बाद भारत नहीं आया था। शिकायतकर्ता प्रमोद रजक ने ट्रायल कोर्ट में गवाही के दौरान अभियोजन का समर्थन नहीं किया। हाईकोर्ट ने इस तथ्य का विस्तृत साक्ष्य-मूल्यांकन नहीं किया, लेकिन इसे मामले की समग्र परिस्थितियों में प्रासंगिक माना। अदालत के समक्ष यह भी आया कि शिकायतकर्ता ने न केवल मुकदमा आगे बढ़ाने की इच्छा नहीं जताई, बल्कि बाद में दोनों आवेदकों के साथ स्वेच्छा से समझौता भी कर लिया।

रजिस्ट्रार ने सत्यापन के बाद समझौते को बताया स्वैच्छिक

शिकायतकर्ता और आवेदकों के बीच समझौते के संबंध में धारा 528 और धारा 359 बीएनएसएस के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। हाईकोर्ट के 30 जून 2026 के आदेश के अनुपालन में 2 जुलाई को रजिस्ट्रार (जे-द्वितीय) ने समझौते का सत्यापन किया। शिकायतकर्ता व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुआ और पहचान के लिए अपना मूल आधार कार्ड प्रस्तुत किया। उसके अधिवक्ता ने भी पहचान की पुष्टि की। रजिस्ट्रार के समक्ष दर्ज बयान में शिकायतकर्ता ने कहा कि उसने बिना किसी धमकी, दबाव, प्रलोभन या अनुचित प्रभाव के अपनी स्वतंत्र इच्छा से समझौता किया है। व्यक्तिगत रूप से प्रश्न पूछने के बाद रजिस्ट्रार ने समझौते को स्वैच्छिक और वास्तविक पाया। हाईकोर्ट ने इस सत्यापित समझौते को मामले की महत्वपूर्ण परिस्थिति माना।

सरकार का दावा- सतीश सनपाल था जुआ कारोबार का सरगना

राज्य की ओर से याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रम्हदत्त सिंह ने दलील दी कि सतीश सनपाल कथित जुआ कारोबार का मुख्य संचालक था, जिसका संचालन विभिन्न शहरों में किया जा रहा था। उनके अनुसार, सोनिया एक शेल कंपनी की मालिक थी और उसने कथित अपराधों को अंजाम देने में कंपनी के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। सरकार ने यह भी कहा कि दोनों आवेदकों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, वे जांच एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रहे हैं और उनकी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। अभियोजन ने यह तर्क भी रखा कि मामला केवल निजी विवाद नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले संगठित जुए से जुड़ा है। ऐसे में समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त नहीं की जानी चाहिए। राज्य ने यह भी बताया कि वर्तमान आवेदकों और उनसे जुड़े अन्य आरोपियों की ओर से दायर नौ याचिकाएं पहले खारिज हो चुकी हैं।

पुराने मामलों में याचिकाएं खारिज होना राहत की राह में बाधा नहीं

हाईकोर्ट ने राज्य की इस दलील पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि पहले खारिज की गई याचिकाएं अलग-अलग अपराध क्रमांकों और अलग आपराधिक कार्यवाहियों से संबंधित थीं। इसलिए उनका खारिज होना वर्तमान याचिका पर विचार करने में अपने आप बाधा नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके अपने तथ्यों, उपलब्ध सामग्री और मुकदमे की आगे की स्थिति के आधार पर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अन्य मामलों या सह-आरोपियों के खिलाफ आरोपों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रही है। उसका विचार केवल वर्तमान अपराध और वर्तमान आवेदकों तक सीमित है।

संगठित जुए की दलील पर भी किया विचार

हाईकोर्ट ने माना कि सामान्यतः ऐसे अपराधों में, जिनका प्रभाव समाज के व्यापक वर्ग पर पड़ता है, केवल निजी समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने में अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए। हालांकि, मौजूदा मामले में राहत का आधार केवल समझौता नहीं था। एक ही मुकदमे में 13 आरोपियों का बरी होना, शिकायतकर्ता का अभियोजन का समर्थन नहीं करना और रजिस्ट्रार द्वारा सत्यापित स्वैच्छिक समझौता भी महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं। इन सभी तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए अदालत ने पाया कि शेष आरोपियों के दोषसिद्ध होने की संभावना अत्यंत क्षीण है।

मुकदमा जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मौजूदा मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में दोनों आवेदकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसके विपरीत, ऐसी कार्यवाही जारी रखना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने समझौते को रिकॉर्ड पर लेने संबंधी आवेदन स्वीकार करते हुए सतीश सनपाल और सोनिया के खिलाफ अपराध क्रमांक 356/2022 से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही और सभी परिणामी कार्रवाइयों को निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश केवल वर्तमान आवेदकों और इसी अपराध से संबंधित है। इससे उनके विरुद्ध अन्य आपराधिक मामलों या किसी अन्य आरोपी के मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं मानी जाएगी।



हाईकोर्ट का आदेश देखें     MCRC-28989-2026

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