पीसीसीएफ शुभ रंजन सेन ने कोर्ट में दिया भरोसा- दोनों के खिलाफ होगी विभागीय जांच, 30 दिन में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, जबलपुर।
सरकारी विभाग की ओर से सरकारी वकील के बजाय निजी अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कराने के मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत की आपत्ति के बाद प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (PCCF) शुभ रंजन सेन ने कोर्ट में आश्वासन दिया कि सतना वन विभाग के संबंधित डीएफओ और रेंजर के खिलाफ विभागीय जांच कर कार्रवाई की जाएगी। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच के समक्ष हुई। कोर्ट ने कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने के लिए 30 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को होगी।
सरकारी केस में निजी वकील क्यों? हाईकोर्ट ने उठाया सवाल
मामला सतना जिले की वन समितियों से जुड़े 25 मजदूरों के न्यूनतम वेतनमान का है। हाईकोर्ट ने 22 सितंबर 2022 को मजदूरों को न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट की ओर से दाखिल पुनर्विचार याचिका में निजी वकील की सेवाएं ली गई थीं। इस पर अदालत ने गंभीर आपत्ति जताते हुए PCCF को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया।
रेंजर को हल्की सजा, DFO पर कार्रवाई क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। कोर्ट के सामने यह बात आई कि रेंजर को रिटायरमेंट से ठीक पहले निंदा जैसी हल्की सजा देकर मामला समाप्त कर दिया गया, जबकि इस प्रक्रिया में मुख्य अनुमति देने वाले तत्कालीन सतना DFO के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। बेंच ने इस स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई।
हाईकोर्ट की दो टूक- मनमानी पर लगाम जरूरी
अदालत ने कहा कि यदि सरकारी अधिकारियों की इस तरह की मनमानी पर रोक नहीं लगाई गई तो इससे प्रशासनिक व्यवस्था में गलत संदेश जाएगा। कोर्ट के अनुसार ऐसी स्थिति में अधिकारियों के बीच यह धारणा बन सकती है कि वे नियमों और Rules of Business से हटकर अपनी सुविधा के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। इसी पहलू को गंभीरता से लेते हुए अदालत ने PCCF से पूरे मामले में कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने को कहा।
PCCF ने कोर्ट में दिया बड़ा आश्वासन
सुनवाई के दौरान PCCF शुभ रंजन सेन व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष उपस्थित हुए। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त किया कि मामले की पूरी जांच कराई जाएगी और संबंधित रेंजर तथा DFO दोनों की भूमिका की विभागीय स्तर पर जांच की जाएगी। जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। PCCF के इस आश्वासन के बाद अदालत ने उन्हें कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए 30 दिन की मोहलत दी।
अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को
हाईकोर्ट ने PCCF को अगली सुनवाई से पहले मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। हालांकि कोर्ट ने अगली सुनवाई में PCCF की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्रदान कर दी है। अब 28 अक्टूबर को यह स्पष्ट होगा कि विभागीय जांच में क्या कार्रवाई की गई और संबंधित DFO तथा रेंजर की भूमिका पर विभाग ने क्या निर्णय लिया।
25 वन श्रमिकों के न्यूनतम वेतन से जुड़ा है मामला
यह पूरा विवाद सतना जिले की वन समितियों में कार्यरत 25 मजदूरों के न्यूनतम वेतनमान से संबंधित है। वर्ष 2022 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश पारित किया था। इसी आदेश के पुनर्विचार के लिए दाखिल याचिका में सरकारी विभाग की ओर से निजी अधिवक्ता की नियुक्ति का मुद्दा सामने आया, जिस पर हाईकोर्ट ने अब संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाया है।
