लाउडस्पीकर के शोर पर हाईकोर्ट सख्त: 7 साल के बच्चे की मौत पर कोर्ट ने जताई चिंता
लॉज़ वर्डिक्ट न्यूज़, इंदौर।
मध्यप्रदेश में लाउडस्पीकर के अनियंत्रित इस्तेमाल और ध्वनि प्रदूषण को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से पेश किए गए जवाब तथा जमीनी स्थिति के बीच अंतर पर गंभीर चिंता जताई। बेंच ने यहाँ तक कहा कि जब शहर में लोग तेज आवाज से परेशान हैं, तब प्रशासन और पुलिस की शोर क्यों सुनाई नहीं देता?
हाईकोर्ट ने एक स्कूल के पास से गुजर रहे जुलूस के दौरान तेज लाउडस्पीकर की आवाज के बीच 7 साल के बच्चे की मौत की खबर का भी उल्लेख किया। अदालत ने ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नियमों के प्रभावी पालन और अधिकारियों की जवाबदेही पर जोर दिया है।
कोर्ट ने खुद महसूस किया लाउडस्पीकर का शोर
इंदौर के अधिवक्ता अमिताभ उपाध्याय और चिन्मय मिश्रा की ओर से दाखिल इस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि सुनवाई के बाद जब न्यायाधीश रात में कोर्ट से अपने आवास की ओर लौट रहे थे, तब उन्हें शहर के विभिन्न हिस्सों में लाउडस्पीकर की तेज आवाज सुनाई दी। अदालत ने कहा कि राज्य की ओर से जवाब में ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों का उल्लेख किया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत गंभीर और निराशाजनक दिखाई देती है। कोर्ट ने प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह जानना चाहा कि यदि तेज आवाज आम नागरिकों को प्रभावित कर रही है तो जिम्मेदार अधिकारी इस स्थिति से कैसे अनजान रह सकते हैं।
स्कूल के पास जुलूस और 7 साल के बच्चे की मौत का जिक्र
अदालत ने सुनवाई के दौरान सुबह प्रकाशित एक समाचार का संदर्भ दिया, जिसमें स्कूल के पास से गुजर रहे जुलूस और तेज लाउडस्पीकर की आवाज के बीच 7 साल के बच्चे की मौत का उल्लेख था। कोर्ट ने इस घटना को ध्वनि प्रदूषण से जुड़े मुद्दे की गंभीरता के संदर्भ में लिया और अधिकारियों से नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर ध्यान देने को कहा। हालांकि, अदालत द्वारा समाचार रिपोर्ट का उल्लेख किए जाने से यह स्वतः स्थापित नहीं होता कि बच्चे की मौत का चिकित्सकीय कारण लाउडस्पीकर की आवाज ही था। इस संबंध में उपलब्ध आधिकारिक या चिकित्सकीय निष्कर्ष को अलग से देखा जाना आवश्यक है।
Noise Pollution Rules का सख्ती से पालन कराने के निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य शासन और पुलिस प्रशासन को Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 तथा मध्यप्रदेश में लागू संबंधित ध्वनि नियंत्रण कानूनों के प्रभावी पालन को सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों का उल्लंघन होने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी होगी।
Silence Zones की सूची अब सार्वजनिक होगी
हाईकोर्ट ने राज्य की ओर से जवाब के साथ उपलब्ध कराई गई Silence Zones की सूची को प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का निर्देश दिया। साथ ही, आम लोगों को यह जानकारी देने के लिए कहा गया कि यदि किसी अन्य महत्वपूर्ण स्थान को Silence Zone घोषित किया जाना आवश्यक है तो वे प्रशासन के समक्ष सुझाव या आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
ध्वनि प्रदूषण की शिकायत के लिए हेल्पलाइन नंबर का प्रचार
अदालत ने ध्वनि प्रदूषण से जुड़ी शिकायतों के लिए उपलब्ध संपर्क नंबर और हेल्पलाइन नंबरों का व्यापक प्रचार-प्रसार करने को भी कहा। इसका उद्देश्य यह है कि आम नागरिक तेज आवाज, नियमों के उल्लंघन या अन्य ध्वनि प्रदूषण संबंधी समस्या की स्थिति में संबंधित अधिकारियों तक तत्काल शिकायत पहुंचा सकें।
एक सप्ताह में मांगी ताजा Status Report
हाईकोर्ट ने राज्य प्रशासन को निर्देश दिया है कि अदालत के निर्देशों पर की गई कार्रवाई की ताजा Status Report एक सप्ताह के भीतर पेश की जाए। रिपोर्ट में ध्वनि नियंत्रण नियमों के पालन, Silence Zones, शिकायत व्यवस्था और अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों की स्थिति स्पष्ट किए जाने की अपेक्षा है।
5 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ऋषभ सिंह चौहान उपस्थित रहे, जबकि राज्य और अन्य प्रतिवादियों की ओर से संबंधित शासकीय अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।
हाईकोर्ट की नजर अब जमीनी अमल पर
मामले में अगली सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एक सप्ताह की कार्रवाई रिपोर्ट होगी। इससे यह स्पष्ट होगा कि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े निर्देशों के पालन के लिए प्रशासन और पुलिस ने क्या कदम उठाए हैं।
