भ्रष्टाचार मामले में बड़ा खुलासा, फर्जी दस्तावेज़ पर उठे सवाल
सीनियर को-ऑपरेटिव इंस्पेक्टर पर साजिश के आरोप
याचिका कर्ता छतरपुर जिले की घुवारा में रहने वाले यादवेंद्र सिंह के अनुसार, एक सीनियर को-ऑपरेटिव इंस्पेक्टर पहले से ही प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत अभियोजन का सामना कर रहा है। आरोप है कि सीनियर को-ऑपरेटिव इंस्पेक्टर, याचिकाकर्ता के पिता जाहर सिंह से रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया था। रिश्वत कांड के बाद सीनियर को-ऑपरेटिव इंस्पेक्टर ने कथित तौर पर याचिकाकर्ता को धमकाया और समझौते के लिए दबाव बनाते हुए एक साथ दो शिकायतें Lokayukta Organisation और Economic Offences Wing (EOW) के समक्ष दर्ज कराईं। दोनों में आय से अधिक संपत्ति के आरोप याचिकाकर्ता पर लगाए गए थे।
लोकायुक्त जांच में शिकायत झूठी, फिर भी EOW ने ठोका केस
लोकायुक्त की शिकायत की जांच हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की गई, जिसमें शिकायत झूठी पाई गई। इसके बावजूद EOW ने उसी शिकायत के आधार पर जांच जारी रखते हुए याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया और अभियोजन स्वीकृति की मांग कर दी।
बिना अधिकार आदेश विवादों में
याचिकाकर्ता का आरोप है कि सहकारिता विभाग छतरपुर के डिप्टी रजिस्ट्रार ने बिना अधिकार क्षेत्र के 19 सितम्बर 2025 को आदेश पारित कर बहुउद्देशीय प्राथमिक कृषि सेवा सरहकारी समिति के प्रशासक को अभियोजन स्वीकृति देने का निर्देश दिया। इसी के अनुपालन में विवादित (impugned) आदेश पारित हुआ, जिसे चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनिल लाला पैरवी कर रहे हैं।
डिस्पैच नंबर में खेल, कोर्ट ने पकड़ी हेराफेरी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि राज्य की ओर से उप महाधिवकता द्वारा जो पत्र पेश किया गया, उसका डिस्पैच नंबर 522 है, जबकि 25 सितम्बर 2025 के विवादित आदेश में डिस्पैच नंबर 520 का उल्लेख है।
कोर्ट ने कहा पेश किया गया पत्र प्रदर्श में संदर्भित पत्र से अलग है। प्रथम दृष्टया यह कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास प्रतीत होता है।
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